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यह एक पूरी पीढ़ी का आंदोलन है

नीट पेपर लीक के खिलाफ जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन और सोनम वांगचुक की 26 दिन तक चली भूख हड़ताल की तुलना 2011 के अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से की जा रही है। ऊपर से देखने पर लगेगा कि वैसा ही आंदोलन है। इससे पहले हुए किसी दूसरे आंदोलन से भी इसकी तुलना की जा सकती है। कह सकते हैं कि छात्र और नौजवान वैसे ही उद्वेलित हुआ, जैसे 2012 में निर्भया कांड के समय था। ऊपरी तौर पर इसकी तुलना पिछले पांच दशक में हुए किसी भी दूसरे आंदोलन से की जा सकती है। जेपी के आंदोलन से भी तुलना कर सकते हैं तो मंडल, मंदिर, किसान, शाहीन बाग, पाटीदार या मराठा आंदोलन के कुछ कुछ तत्व इस आंदोलन में भी तलाशे जा सकते हैं। लेकिन थोड़ी बारीकी से देखेंगे तो पता चलेगा कि यह आंदोलन अब तक हुए सभी आंदोलनों से कई मायने में भिन्न है।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी पहचान है कि इसमें किसी तरह की अस्मिता नहीं तलाश सकते हैं। इस लिहाज से यह जेपी और अन्ना हजारे के आंदोलन की तरह है। उन दोनों आंदोलनों में भी समाज का हर वर्ग शामिल था क्योंकि उनमें जिस चीज का विरोध किया जा रहा था वह हर वर्ग को प्रभावित करने वाली थी। बाकी आंदोलनों में किसी न किसी तरह की अस्मिता का मामला रहा है। मंडल से लेकर मराठा या पाटीदार आरक्षण के आंदोलन में जातीय अस्मिता प्रमुख थी। मंदिर आंदोलन में भी हिंदू अस्मिता बहुत मुखर थी तो शाहीन बाग में मुस्लिम अस्मिता। निर्भया कांड के समय हुआ आंदोलन एक फ्लैश प्रोटेस्ट था, जो एक घटना से उपजा था और जल्दी ही समाप्त हो गया। उसका दायरा पूरे देश में नहीं फैला था।

इन सबसे उलट नीट यूजी के पेपर लीक के खिलाफ चल रहा आंदोलन पूरी तरह से छात्रों और युवाओं का है। इसमें एक खास बात यह भी है कि कोई एक व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता है कि वह आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है। सोनम वांगचुक जरूर इस आंदोलन की नैतिक ताकत हैं लेकिन नेतृत्व उनके हाथ में भी नहीं है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके भी आंदोलन का नेतृत्व करने का दावा नहीं कर सकते हैं। ऐसे आंदोलन के अक्सर अराजक हो जाने का खतरा रहता है।

परंतु यह आंदोलन इतना लंबे चलने के बावजूद अराजक नहीं हुआ। जंतर मंतर पर मोटे तौर पर शांति बनी रही। दिल्ली से बाहर दूसरे राज्यों में जरूर कुछ प्रदर्शनों में हिंसा होने की खबरें आईं लेकिन दिल्ली में पुलिस की बड़ी कार्रवाई के बावजूद शांति रही। इसका कारण यह था कि आंदोलन में असली स्टेकहोल्डर्स शामिल थे। यानी ऐसे छात्र शामिल हुए, जिनको अपना भविष्य बचाना है। वे पेशेवर नेता या प्रदर्शनकारी नहीं थे। छात्र और युवा अपने वास्तविक सरोकारों की वजह से जंतर मंतर पर पहुंचे थे।

असल में शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था की गड़बड़ियों के खिलाफ गुस्सा काफी समय से जमा हो रहा था। यह सिर्फ अखिल भारतीय परीक्षाओं जैसे नीट यूजी या जेईई या सीयूईटी आदि का मामला नहीं है। दाखिले और नौकरी के लिए होने वाली राज्यों की प्रतियोगिता परीक्षाओं में भी लगातार गड़बड़ी हो रही थी। छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि परीक्षाओं का कैलेंडर नहीं बना है। नियमित परीक्षाएं नहीं होती हैं।

कई साल की परीक्षाओं को मिला कर एक परीक्षा होती है और उसमें भी पेपर लीक हो जाता है या परीक्षा केंद्र मैनेज करके अलग तरह की धांधली होती है। अगर पेपर लीक या परीक्षा केंद्र मैनेज होने की घटना न हो तो प्रश्न पत्र में गड़बड़ी हो जाती है, उत्तर पुस्तिका जांचने में गड़बड़ी हो जाती है या नतीजे आने में बहुत समय लग जाता है। कई साल की परीक्षा एक साल कराने की वजह से बड़ी संख्या में छात्रों की उम्र सीमा पार हो जाती है। इन सबका संचित गुस्सा जंतर मंतर पर निकला है।

शिक्षा और परीक्षा की व्यवस्था में गड़बड़ियों से परेशान एक पूरी पीढ़ी ने इस आंदोलन में हिस्सा लिया है। यह इसकी सबसे खास बात है। जिस पीढ़ी को ‘जेन जी’ कहा जाता है और जिसमें 14 से लेकर 29 साल तक के युवा हैं, वह पीढ़ी इस आंदोलन में सड़कों पर उतरी। यह फीगर ऑफ स्पीच नहीं है कि ये आंदोलन ‘जेन जी’ का। सचमुच आठवीं, नौवीं क्लास की लड़कियां, जिनकी उम्र 14 या 15 साल की है वो प्रदर्शन करने पहुंचीं। अपने क्लास की किताब लेकर लड़कियां आईं, जिन्होंने पढ़ कर सुनाया कि लोकतंत्र का क्या मतलब होता है और आज वास्तव में क्या हो रहा है। वयस्क होने से पहले की उम्र के सैकड़ों छात्र और युवा जंतर मंतर पर दिखाई दिए, जिनके चेहरे पर दृढ़ प्रतिबद्धता थी। वे किसी राजनीतिक विचार से प्रभावित नहीं थे। उनको अपने भविष्य की चिंता थी। उनको लग रहा था कि ऐसे ही चलता रहा तो उनकी पढ़ाई और उनका परिश्रम व्यर्थ जाएगा। किशोर उम्र के बच्चे और बच्चियां जिद करके अपने अभिभावकों को लेकर जंतर मंतर पहुंचीं। अन्ना हजारे के आंदोलन में लोग बच्चों को तमाशा दिखाने ले जाते थे इस बार बच्चे अपने माता पिता को लेकर पहुंचे। सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे कई पुलिसकर्मियों ने कहा कि उनके बच्चे भी आंदोलन में शामिल हैं। अनेक बच्चों ने कहा कि उनके माता पिता भाजपा के समर्थक हैं और वे उनसे छिप कर जंतर मंतर पहुंचे हैं।

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