पिछले साल जुलाई के बाद से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता घटने लगी थी। ज्यादातर एजेंसियों के सर्वेक्षण में उनकी रेटिंग नीचे जा रही थी। इस साल 28 फरवरी को जब उन्होंने ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ा और उसके बाद आपूर्ति शृंखला बाधित होने से अमेरिका में महंगाई बढ़नी शुरू हुई तो ट्रंप की लोकप्रियता बिल्कुल निचले पायदान पर पहुंच गई। फिर भी मिडटर्म चुनाव में उनके लगातार प्रचार से मीडिया और सोशल मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अंदाजा लगाता रहा कि ट्रंप कोई करिश्मा कर सकते हैं। रिपब्लिकन पार्टी की इतनी बड़ी हार का अनुमान चुनिंदा अखबारों और मीडिया समूहों को छोड़ दें तो कोई नहीं लगा रहा था।
इसका एक बड़ा कारण यह था कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स इलॉन मस्क का है, जो राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थन में थे। खुद ट्रंप अपना एक प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल चलाते हैं, जहां से वे अपना नैरेटिव पुश कर रहे थे। फॉक्स न्यूज शुरू से दक्षिणपंथी और रिपब्लिकन रूझान वाला है। इसके अलावा मेटा और गूगल जैसी कंपनियां भी पिछले काफी समय से ट्रंप के आदेशों का पालन कर रही हैं। सिलिकन वैली में ट्रंप ने चाहे जैसे भी हो, अपना असर बनाया था। उन्होंने विरोध की आवाज को दबाने के लिए सारे जतन किए थे। अमेरिका की सदियों पुरानी यूनिवर्सिटीज का कैरेक्टर बदलने के प्रयास किए थे। फंडिग रोक कर और रेगुलेशनंस बदल कर कॉलेज और यूनिवर्सिटीज को ट्रंप के हिसाब से काम करने के लिए बाध्य किया गया था। उनके प्रशासन ने मीडिया से लेकर बौद्धिक जगत तक को डराने और झुकाने का प्रयास किया था। इसके बावजूद उनकी पार्टी बुरी तरह से हारी।
सो, भारत में भी मीडिया और सोशल मीडिया पर सरकारी कंट्रोल और नैरेटिव को मनमाफिक दिशा देने की कोशिश चुनावी जीत दिला देगी, ऐसा नहीं कहा जा सकता है। पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है। 2004 में भी मीडिया कहीं से अटल बिहारी वाजपेयी के हारने की संभावना नहीं बता रहा था। पिछले चुनाव में तो मीडिया और सोशल मीडिया चार सौ पार का नारा लगा रहे थे। बहरहाल, भारत में एक एक करके तमाम मीडिया संस्थान बड़े कॉरपोरेट के हाथों में चले गए गए। मोदी सरकार में क्रोनी कैपिटलिज्म का चेहरा बने संस्थान मीडिया को संभाल रहे हैं और सोशल मीडिया नैरेटिव को बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
सरकारी नियमन के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भी कंट्रोल किया जा रहा है। म्यांमार के बाद भारत में सबसे ज्यादा इंटरनेट बंद किया जाता है और संभवतः दुनिया के किसी देश में इतनी पोस्ट हटाने के लिए नहीं कहा जाता है, जितना भारत में कहा जाता। सरकार हर दिन बड़ी संख्या में पोस्ट हटाने के लिए तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से कहती है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले या राजनीतिक विरोधियों की पोस्ट सरकार हटवाती या उनकी पहुंच कम कराती है। कई तरह के रेगुलेशन्स के जरिए उनको बांधा जा रहा है। एक खबर यह भी है कि इंटरमीडियरी होने के नेता प्लेटफॉर्म्स को जो छूट मिली है उसे सरकार खत्म करने जा रही है और हर पोस्ट के लिए प्लेटफॉर्म्स को जिम्मेदार बनाने की तैयारी की जा रही है। इससे सोशल मीडिया के ऊपर अतिरिक्त दबाव बनेगा। पर क्या इससे सरकार को हराने का लोगों का बनता मन खत्म हो जाएगा। कतई नहीं। और यह अमेरिका में ट्रंप के सोशल मीडिया, मीडिया प्रबंधन से जाहिर है। वहां साबित हुआ कि सरकार मीडिया को दबाने की जितनी कोशिश करेगी उतनी ही लोगों में मन ही मन सरकार के खिलाफ गांठ बनेगी? तभी ट्रंप की पार्टी उन सीटों पर भी दशकों बाद हारी जो उसके अभेद किले थे!
