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छोटी सी जरूरत कितनी भारी

भारत में पश्चिम एशिया की जंग का कैसा असर हुआ है यह अलकतरा की आपूर्ति घटने में देखा जा सकता है। भारत अपनी जरुरत का करीब 35 फीसदी अलकतरा याकि डामर खाड़ी के देशों खास कर ईरान, इराक और यूएई से आयात करता है। ईरान में जंग और होर्मुज की खाड़ी बंद होने से इसकी सप्लाई बंद हो गई। इसका असर यह हुआ है कि सड़कों, हाईवे आदि के निर्माण की रफ्तार धीमी हो गई। खबर है कि जहां 20 हजार टन की जरुरत थी वहां सात हजार टन अलकतरा की आपूर्ति हुई है और इसका एक असर है कि अलकतरा का कीमत 40 हजार से बढ़ कर 50 हजार रुपए टन हो गई है। यानी एक बार में 25 फीसदी कीमत बढ़ी है। खबर है कि अलकतरा की कमी से दिल्ली में बारापुला के तीसरे चरण का निर्माण कार्य धीमा पड़ गया। 15 दिन पहले इसे पूरी तरह से बंद करना पड़ा था क्योंकि अलकतरा की सप्लाई नहीं हो रही थी।

पश्चिम एशिया की जंग से जो एक सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ वह उर्वरक यानी खाद का सेक्टर है। भारत में उर्वरक आयात का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। इसके अलावा भारत की निर्माण इकाइयां पश्चिम एशिया से आने वाली प्राकृतिक गैस पर निर्भऱ हैं। यूरिया के लिए पर्याप्त प्राकृतिक गैस नहीं मिली और डीएपी के लिए फॉस्फोरिक एसिडा. पोटाश, सल्फर आदि सबकी कमी हो गई। जो तैयार उर्वरक पश्चिम एशिया से आता था उसकी आपूर्ति रूक गई। इसका असर यह हुआ कि भारत में रासायनिक खाद की कीमत में 30 से 40 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई। आपूर्ति कम हुई वह अलग है। भारत के लिए अच्छी बात यह रही कि यहां रबी की फसल कट रही है और खरीफ की फसल अगले महीने से शुरू होगी। लेकिन अगर आपूर्ति शृंखला में बाधा रहती है तो कीमतें और बढ़ेंगी या सरकार को सब्सिडी बढ़ानी होगी। सीमेंट और स्टील के उत्पाद की लागत भी बढ़ी है। सीमेंट पर प्रति टन दो सौ रुपए लागत बढ़ने की खबर है। इसके अलावा कंस्ट्रक्शन पर इस वजह से भी असर पड़ा है कि मजदूर लौट गए हैं। इससे काम धीमा हुआ तो उसका असर सीमेंट और स्टील दोनों के उत्पादन पर पड़ने की संभावना है।

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