Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

ले-देकर वोट धांधली ही सहारा

सवाल है चुनाव आयोग, ज्ञानेश कुमार जैसे भक्त अफसरों के बूते एसआईआर से कितने करोड़ भाजपा विरोधी मतदाताओं के नाम कटाएं जा सकते हैं? फिलहाल 13 करोड़ वोटरों के नाम पुरानी लिस्ट से बाहर हुए हैं। इनमें जिन तीन करोड़ बांग्लादेशियों का हल्ला है, उसमें तीन लाख की भी संख्या प्रामाणिक नहीं है। मतलब यह संख्या ही गोलमाल की बानगी है। पर इन बातों का मोदी-शाह पर असर नहीं होना है। वे वैसा ही करेंगे जैसे ट्रंप अपनी धुन में करते गए। बूथवार वोट प्रबंधन (खासकर हिंदीभाषी प्रदेशों में), सीटों के परिसीमन और महिला आरक्षण के बिल आदि से मोदी-शाह 2029 के लोकसभा चुनाव में अपनी गणित का पूरा बंदोबस्त करेंगे।

एक तरह से वही जो ट्रंप और उनके पार्टी प्रबंधकों ने ताजा मध्यावधि चुनावों से पहले किया। हां, जान लिया जाए कि अमेरिका और उसकी राजनीति के हर जानकार हैरान हैं कि कट्टरपंथी गोरों, अनुदारवादियों वाले टेक्सास, फ्लोरिडा, जॉर्जिया जैसे राज्यों में भी ट्रंप के उम्मीदवार चुनाव हारे। दशकों बाद उन सीटों पर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के अनाम चेहरे जीते हैं जो रिपब्लिकन पार्टी के अभेद्ध गढ़ थे। भारत में मानों जैसे भाजपा के गुजरात और मध्य प्रदेश गढ़ हैं!

कैसे यह हुआ? इसलिए क्योंकि ट्रंप की धांधली की मंशा (जैसे आज मोदी-शाह की मंशा) ने अमेरिका में घर-घर नैरेटिव बनाया। अमित शाह इन दिनों ज्ञानेश कुमार को बचाने, एसआईआर के बचाव के लिए जैसे मुखर हैं, लगभग उसी तरह ट्रंप पिछले एक-दो साल से चुनाव प्रक्रिया, चुनाव संचालन के नियमों, मतदाता पंजीकरण और मतदाता डेटा में केंद्र सरकार की मनमानी की व्यापक कानूनी तथा प्रशासनिक कोशिशों की सुर्खियां बनाते रहे। मोदी-शाह संसद से परिसीमन का फैसला नहीं करा पाए लेकिन ट्रंप और उनके रिपब्लिकन नेतृत्व ने आठ राज्यों में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन कराया। यह सोचते हुए कि इससे उनकी पार्टी को 16 अतिरिक्त सीटें मिलेगी। पर नतीजों में उन सीटों में भी ट्रंप के उम्मीदवार हारे।

अमेरिका में चुनाव के अधिकृत कामों की व्यवस्था राज्यों के चुनाव आयोगों के अधीन है। इसे रुकवाने, बदलवाने, प्रभावित करने के लिए 2025 से नवंबर 2026 तक ट्रंप प्रशासन, रिपब्लिकन नेशनल कमेटी, राज्य रिपब्लिकन संगठनों और सहयोगी समूहों ने अदालतों में कई याचिकाएं डालीं। जैसे मोदी सरकार ने अदालत के जरिए पश्चिम बंगाल के चुनाव से ठीक पहले लाखों मतदाताओं का मताधिकार पेंडिंग करवाया। वैसी ही कोशिश ट्रंप की भी थी। ट्रंप के जस्टिस विभाग से संवेदनशील मतदाता डेटा प्राप्त करने के लिए कोई 31 याचिकाएं अदालतों में डालीं।

मगर अमेरिकी अदालतों ने अधिकांश याचिकाओं को खारिज किया। प्रदेशों के चुनाव आयोग भी ट्रंप प्रशासन के प्रभाव (रिपब्लिकन प्रदेशों को छोड़कर) में नहीं आए। तभी मजेदार बात है कि ट्रंप प्रशासन के मनमाने-धांधली भरे इरादों पर उलटी प्रतिक्रिया उनके गुजरात, मध्य प्रदेश जैसे रिपब्लिकन राज्यों में ही सर्वाधिक हुई। इन्हीं राज्यों में ट्रंप की पार्टी के हारने का वह इतिहास बना, जिसे अमेरिकी राजनीति शायद ही कभी भुला पाए।

इसीलिए मेरी धारणा है कि कॉकरोच पार्टी के जन्म के बाद से मोदी सरकार अपनी राजनीति के लिए जितने भी उपाय करते हुए है वह घरों में, नौजवानों में, लड़के-लड़कियों में मन ही मन मोदी सरकार के खिलाफ वही वितृष्णा बनाते हुए हैं जैसे अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ बनी। अमेरिका में इससे लोकतंत्र का पुनर्जन्म हुआ। उम्मीद करें, भरोसा रखें भारत में भी वही होगा!

Exit mobile version