यों इसकी वजह समाज भी है लेकिन सत्ता की ज्यादा जिम्मेदारी है कि देश में साहित्य के फलने फूलने का जो इकोसिस्टम था उसका पतन रोके। संस्कृति को बढ़ाए, निखारे। मगर संस्कृति संरक्षण के नाम पर होने वाले आयोजनों की संख्या लगातार कम होती हुई है और अगर आयोजन होता भी है तो उसमें से सौंदर्य गायब है। उलटे वह भोंडेपन का प्रदर्शन बनता जा रहा है। सोचें, एक समय देश में साहित्य के कितने केंद्र थे। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद और वाराणसी साहित्य और संस्कृति का बड़ा केंद्र थे तो बिहार में पटना, मध्य प्रदेश में भोपाल व जबलपुर, राजधानी दिल्ली, पश्चिम बंगाल में कलकत्ता ये सब बड़े केंद्र थे। दक्षिण भारत की भाषाओं मलयालम, तमिल, तेलुगू और कन्नड़ में उत्कृष्ट साहित्य रचा जा रहा था। उसका अनुवाद हिंदी क्षेत्र में भी खूब बिकता था। लेकिन आज किसी कॉलेज के छात्र से समकालीन साहित्यकारों, कवियों, उपन्यासकारों के बारे में पूछा जाए या उनकी कोई कविता पढ़ने को कहा जाए तो ज्यादा संभावना है कि वह नहीं पढ़ पाएगा।
राजधानी दिल्ली से लेकर छोटे शहरों तक में भरत नाट्यम से लेकर कुचिपुड़ी और कत्थक नृत्य का आयोजन होता था। अब ऐसे आयोजन या तो बहुत कम होते हैं या बिल्कुल बंद हो गए हैं। नई पीढ़ी के किसी नौजवान से पूछा जाए कि वह दो चार शास्त्रीय संगीतकारों और नृत्य कला का प्रदर्शन करने वालों के नाम बताए तो गारंटी है कि वह नहीं बता पाएगा। इसे पुरानी पीढ़ी का मोह या श्रेष्ठता बोध कह कर खारिज नहीं कर सकते हैं लेकिन यह हकीकत है कि आज कहीं न तो बिस्मिल्ला खां हैं, न कहीं पंडित भीमसेन जोशी, न पंडित रविशंकर, न पंडित जसराज हैं और न किशोरी अमोनकर हैं। कोई उस्ताद अमजद अली खां या उस्ताद जाहिर हुसैन भी नहीं है। न कोई एमएफ हुसैन हो रहा है और न कोई हैदर रजा हो रहा है। साहित्य, कला, संस्कृति, फिल्म सब बौने लोगों की जमात हो गई है। पूरे देश में मूर्खता का महोत्सव मनाया जा रहा है। जो जितनी मूर्खतापूर्ण बात कर सकता है उसकी प्रगति के उतने ही आयाम खुलते जाएंगे। तर्क और विचार की जगह अनुशासन और आदेश पालन, भौंडेपन पर जोर हो गया है।
