यह यक्ष प्रश्न है कि क्या खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय वापस लौटेंगे? यह भी सवाल है कि क्या भारत सरकार खाड़ी के भारतीयों को लौटा लाने के लिए वैसा ही कोई अभियान चलाएगी, जैसा यूक्रेन से भारतीयों को लाने के लिए चला था? चार साल पहले फरवरी 2022 में यूक्रेन में जंग छिड़ी तो वहां फंसे भारतीयों को लाने का बड़ा हल्ला मचा। कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक फोन करके युद्ध रूकवा दिया ताकि वहां पढ़ाई कर रहे भारत के छात्रों को सुरक्षित निकाला जाए। युद्ध रूकवाने का नैरेटिव कई महीनों, बरसों तक चलता रहा। ईरान में भी पिछले साल जून में हुए सीमित हमले के बाद भारतीयों को निकालने का अभियान चला। भारत सरकार ने ऑपरेशन सिंधु नाम से एक अभियान चलाया।
पर न तो भारतीयों को वहां से निकालने की रफ्तार वैसी है, जैसी पहले के अभियानों में थी। तभी यह सवाल भी है क्या सरकार चाहती भी है कि खाड़ी देशों से भारतीय नागरिक निकलें?
इन दिनों रोज भारत सरकार के कई मंत्रालय साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं। युद्ध के हालात के बारे में बताते हैं। विदेश मंत्रालय से लेकर शिपिंग, पेट्रोलियम व सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधिकारी इसमें शामिल होते हैं। इसमें कच्चे तेल और गैस की उपलब्धता की जानकारी के साथ साथ बताया जाता है कि कितने भारतीय खाड़ी देशों से निकल कर वापस आए हैं। पिछली प्रेस कॉन्फ्रेंस में आंकड़ा था कि करीब सवा दो लाख भारतीय वापस लौटे हैं। इनमें से ज्यादातर भारतीय नागरिक सर्विस फ्लाइट से लौटे हैं। ध्यान रहे हमले के बाद थोड़े दिन तक जब एयरस्पेस बंद रहा तब लोग फंसे रहे।
लेकिन एयरस्पेस खुलने और हवाई सेवा बहाल होने के बाद लोगों ने विमानन कंपनियों की नियमित उड़ानों से वापसी शुरू की। वैसे भी हमला रमजान के महीने में हुआ था और खाड़ी में रहने वाले मुस्लिम ईद के लिए भारत आने वाले थे। ईद के लिए भारत आने की तैयारी कर चुके काफी लोग नियमित उड़ानों से लौटे हैं। एयर इंडिया और इंडिगो ने विशेष उड़ानें भी संचालित की, जिनके जरिए भारतीय लोगों को लाया गया। परंतु जैसा इससे पहले होता था उस तरह से भारतीय वायु सेना के विमान भेज कर लोगों को वापस लाने का कोई अभियान नहीं दिख रहा है। उन अभियानों में वापस लौटने वाले लोग भारत माता की जय के नारे लगाते थे और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति आभार प्रकट करते थे।
गौरतलब है कि ईरान में भारत के बहुत कम लोग हैं। करीब 11 हजार लोग हैं, जिनमें ज्यादातर छात्र हैं और थोड़े से लोग हैं, जो धार्मिक यात्रा पर गए थे। जरुरत थी युद्धग्रस्त ईरान से लोगों को निकालने की। लेकिन वहां सरकार ने यथास्थिति रहने दी है। वहां मुश्किल इलाकों में फंसे भारतीयों को विमान की सेवा नहीं मिल पा रही है। उनको सड़क के रास्ते आर्मेनिया या अजरबैजान जाना पड़ रहा है। वहां से विमान के जरिए वापस आ रहे हैं। समुद्री रास्ते से भी कुछ लोगों को निकाला गया है।
असली मुद्दा यह है कि खाड़ी देशों का मामला यूक्रेन से अलग है। यूक्रेन में ज्यादातर छात्र गए थे, जो वहां भारत का पैसा खर्च कर रहे थे, जबकि खाड़ी देशों से भारत को कमाई आती है। खाड़ी में करीब 90 लाख भारतीय काम करते हैं, जो हर साल लाखों करोड़ रुपए भारत भेजते हैं। एक रिपोर्ट को मुताबिक भारत को हर साल पूरी दुनिया से 12 लाख करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा का रेमिटेंस मिलता है, जिसमें सें से पांच से साढ़े पांच लाख करोड़ रुपया खाड़ी देशों से आता है। यानी विदेश से भारतीय लोग जो पैसा भेजते हैं उसका लगभग आधा खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय कामगार और पेशेवर भेजते हैं। केरल और तमिलनाडु जैसे विकसित राज्यों से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे पिछड़े राज्यों में भी आबादी का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आने वाले पैसे पर निर्भर है।
अगर ईरान पर इजराइल और अमेरिका के हमले से पैदा हुए संकट की वजह से खाड़ी देशों से भारतीयों का व्यापक रूप से लौटना शुरू हुआ तो रेमिटेंसेज का स्रोत बंद होगा। वापस लौटने के बाद वहां के हालात की वजह से लोगों की वापसी मुश्किल होगी। अगर भारतीय लोग खाड़ी में इस संकट के समय भी टिके रहते हैं तो युद्ध खत्म होने के बाद पुनर्निर्माण कार्य में उनकी जरुरत पड़ेगी। इसलिए लोग भी नहीं चाहते हैं कि वे वापस लौटें और सरकार की भी मंशा यही होगी कि कोई विशेष अभियान चला कर लोगों को वापस लाने की जरुरत न पड़े। ईरान के खिलाफ चल रही जंग का रूकना कई कारणों से भारत के लिए बहुत जरूरी है। कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति तो प्रभावित हो ही रही है अगर कामगारों और पेशेवरों की वापसी तेज हुई थो अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार पड़ेगी। रेमिटेंसेज का पैसा डॉलर में आता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार को व्यवस्थित रखने में मदद मिलती है। साथ ही यह रकम स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य मद में खर्च के रूप में वापस अर्थव्यवस्था में आती है।
