पश्चिम बंगाल सिर्फ कला, संस्कृति, धर्म और समाज सुधार का केंद्र नहीं था। बौद्धिक विमर्श के साथ साथ वह व्यापार का भी केंद्र था। कलकत्ता देश की राजधानी था। एक समय हुगली का बंदरगाह दुनिया के सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से एक था। 18वीं सदी में दशकों तक ऐसा समय रहा, जब किसी भी समय हुगली के बंदरगाह पर 17 सौ जहाज खड़े होते थे। दुनिया भर का कारोबार वहां से होता था। तभी भले अंग्रेज, पुर्तगाली या डच और फ्रांसीसी दक्षिण के समुद्र तट पर पहले पहुंचे लेकिन उन्होंने अपने शासन और व्यापार का केंद्र बनाया कलकत्ता को। मुगल शासन के अंतिम दिनों में बंगाल के नवाब ही इतना पैसा भेजते थे, जिससे दिल्ली की सल्तनत चलती थी। उस पैसे को सुरक्षित दिल्ली पहुंचाने के लिए जगत सेठ और हुंडी की व्यवस्था बनी और मजबूत हुई। कलकत्ता में जगत सेठों को पास नवाब का पैसा जाता थी और नवाब दिल्ली में उसके बदले में उतना ही पैसा मुगल शासक देते थे। ठगों और लुटेरों के आतंक की वजह से ऐसा करना पड़ता था।
समय के साथ इसमें बहुत से कैरेक्टर आए और गए। लॉर्ड क्लाइव की लूट, मीर जाफर की धोखेबाजी और मीर कासिम की बर्बरता ने सब समाप्त किया। जगत सेठ भी मारे गए और कलकत्ता का गौरव भी समाप्त हुआ। आखिर 1911 में राजधानी दिल्ली आई। उसके बाद भी कलकत्ता में उद्योग व कारोबारी गतिविधियां चलती थीं। जूट की फैक्टरियां थीं तो चीनी मिल भी चलते थे। कला, संस्कृति, फिल्म, साहित्य आदि के साथ साथ व्यापार भी होता था। लेकिन कम्युनिस्ट और तृणमूल के राज में सब समाप्त हुआ।
यह भी संयोग है कि 2011 में ममता बनर्जी ने सिंगुर और नंदीग्राम में आंदोलन किया, जिसके बाद टाटा की नैनो कार की फैक्टरी वहां नहीं लगी और नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री रहते गुजरात के सानंद में नैनो की फैक्टरी लगाई, जो वहां भी विफल हो गई। अब टाटा की फैक्टरी सिंगुर से सानंद ले जाने वाले नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं और उनकी पार्टी पश्चिम बंगाल की सत्ता में आई है। सो, अब तो कहा जा सकता है कि जैसे गुजरात में फैक्टरियां लग रही हैं, चिप से लेकर हवाई जहाज तक बनाने के कारखाने स्थापित हो रहे हैं, निवेश आ रहा है, बुलेट ट्रेन बन रही है वैसा ही कुछ पश्चिम बंगाल में भी होगा?
लेकिन मुश्किल यह है कि अगर बिहार, बंगाल, ओडिशा जैसे राज्यों में विकास हो जाए, फैक्टरियां लग जाएं तो फिर गुजरात और महाराष्ट्र के कारखाने चलाने के लिए मजदूर कहां से मिलेंगे? इसलिए बिहार के साथ साथ बंगाल को भी देखते रहना होगा। वहां आज के जगत सेठों को जमीनें मिलेंगी, सरकारी पैसा मिलेगा, सरकारी पैसे से विकसित प्रतिष्ठान मिलेंगे, खदान मिलेंगे लेकिन क्या विकास भी मिल पाएगा? वहां पुराने शहर हैं, बंदरगाह है, आबादी है और उद्योग व व्यापार दोनों की संभावना है। पश्चिमी भारत के राजा और पश्चिमी भारत के जगत सेठ पूर्वी भारत में क्या करते हैं यह देखने वाली बात होगी।
