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सपनों को गाते-गाते बना अमेरिका

अमेरिका ढाई सौ वर्ष का हुआ। इस शुक्रवार-शनिवार उसके जश्न की कुछ झलकियां टीवी पर देखी। एक परिचित धुन कानों में पड़ी—“डोंट स्टॉप बिलीविन” (Don’t Stop Believin’)। बरसों पुराना यह गीत मेरी पचास वर्षों की स्मृतियों को खोल गया। गीत सुन मुझे ब्रूस स्प्रिंगस्टीन की आवाज़ भी याद हो आई। ब्रूस स्प्रिंगस्टीन ने “बॉर्न टू रन” (Born to Run..) और बाद में “बॉर्न इन द यू.एस.ए.” (Born in the U.S.A…) को जिस अंदाज में गया, वह गजब ही था। अचानक समझ आया कि पिछले पचास वर्षों में मैंने अमेरिका को जितना समझा, पढ़ा, और उस पर जितना लिखा उससे कहीं अधिक तो उसके गीतों की जुबानी अमेरिका की यात्रा है।

संयोग है मैं पचास साल से गवाह हूं। मैं जब छोटे से कस्बे भीलवाड़ा से निकलकर दिल्ली के जेएनयू में पहुँचा था, तब मेरे भीतर भी एक दौड़ शुरू हुई थी। दुनिया को जानने की, समझने की, पढ़ने की और अपनी टूटी-फूटी हिंदी में उसे लिखने की। वह आपातकाल का समय था। मेरे लिए जेएनयू की लाइब्रेरी कौतुकता के मेरे डीएनए की मानों पूर्ति थी। विदेशी पत्र-पत्रिकाएं, अखबार, विश्लेषण—जो हाथ लगा, पढ़ता था। उसी से संयोग बना और कुछ ही महिनों में मैंने वैश्विक घटनाओं पर लिखना शुरू किया। 16 दिसंबर 1976 को दैनिक हिंदुस्तान में पहला लेख छपा, वह भी अंतरराष्ट्रीय विषय पर। तब भारत में आपातकाल था। इसलिए हिंदी अखबारों को दुनिया पर लिखा चाहिए था और सुरक्षित भी था। इसलिए सोवियत संघ, अमेरिका, यूरोप और शीतयुद्ध की राजनीति मेरा शगल बनी। कुछ ही महीनों में दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं से लेकर राजेंद्र माथुर के नेतृत्व वाले नई दुनिया में परिक्रमा कॉलम लिखने का मेरा सिलसिला बना, पत्रकारिता की भूमिका बनी।

उन दिनों चालीस, साठ और पचहत्तर रुपए प्रति लेख मिलते थे। आवश्यकता से अधिक। नतीजतन कनॉट प्लेस की सेंट्रल न्यूज़ एजेंसी से टाइम, द इकोनॉमिस्ट, हिम्मत, ओपिनियन, क्वेस्ट जैसी पत्रिकाएं खरीदता। बगल के प्रिया और चाणक्य सिनेमाघरों में हॉलीवुड फिल्में देखता। दुनिया को पढ़ने के साथ-साथ देखने की आदत भी बनी।

वह अमेरिकी राष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड और सोवियत नेता ब्रेज़नेव का समय था। अब ट्रंप और पुतिन का है। 1975-76 का अमेरिका आज भी मेरी स्मृति में बहुत साफ़ है। सैगॉन में अमेरिकी दूतावास की छत से हेलीकॉप्टरों के उड़ान भरने की तब तस्वीरें थीं। राष्ट्रपति निक्सन और वाटरगेट कांड की गूंज थी। 1976 में अमेरिका के दो सौ वर्ष पूरे हुए। उत्सव हुआ, मगर अमेरिका में युद्ध हारने की पीड़ा थी, गहरी निराशा थी। सत्ता पर अविश्वास था और भविष्य को लेकर अनिश्चितता।

उसी दौरान ब्रूस स्प्रिंगस्टीन का संभवतः पहला बड़ा गीत “बॉर्न टू रन” सुपरहिट हुआ। वह तब एक पीढ़ी की बेचैनी की आवाज़ था, जो कह रही थी—यहां दम घुट रहा है, कहीं निकल चलो। छोटे शहर से बाहर निकलो। सीमाएं तोड़ो। अपना भविष्य खुद बनाओ। स्प्रिंगस्टीन अमेरिकी मजदूर, छोटे शहरों और अमेरिकी सपने की प्रामाणिक आवाज़ बन गए। वह आवाज़, जो रोनाल्ड रीगन से लेकर डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता को ठेंगा दिखाती रही है। क्योंकि उनकी आवाज़ में अमेरिकी सत्ता नहीं, बल्कि व्यक्ति और नागरिक के सपनों का अमेरिका है। वह अमेरिका, जहां व्यक्ति अपनी मेहनत और प्रतिभा से अपना भविष्य गढ़ता है। खुद अवसर खोजता है, मेहनत से अपने सपनों को साकार बनाता है।

फिर 1981 में एक गीत आया -“डोंट स्टॉप बिलीविन”। जर्नी बैंड के गायक स्टीव पेरी की आवाज़ के इस गीत ने 1981 अमेरिका को ऐसा बांधा कि आज भी वह सर्वाधिक लोकप्रिय है। इसकी शुरुआती पंक्तियां—“एक छोटे कस्बे की लड़की…” और “एक छोटे कस्बे का लड़का…”—सीधे अमेरिकी मानस को छू गई। साधारण परिवार, छोटे शहर पर बड़े सपने।

गीत का संदेश जो टूक यह कि —उम्मीद मत छोड़ो। विश्वास बनाए रखो। मतलब अमेरिका सपनों के लिए, विश्वास के साथ है।

तब से अब तक आर्थिक मंदी हो, व्यक्तिगत संकट हो, खेल का मैदान हो या राष्ट्रीय उत्सव—अमेरिका में गीत हर जगह गाया जाता है। ढाई सौवें स्थापना दिवस के समारोह में जब हजारों अमेरिकी इसके अंतिम कोरस तक एक साथ पहुंचे, तो सचमुच लगा कि वे गीत नहीं मात्र नहीं गा रहे थे वे निज विश्वास में देश को अभिव्यक्त कर रहे हैं।

अचानक मन में प्रश्न उठा। क्या दुनिया के किसी और देश में ऐसे गीत है, जिसे पूरा समाज अपने साझा सपने की तरह गाता हो? रूस, चीन, ब्रिटेन, पाकिस्तान या भारत—हर देश के पास अपने राष्ट्रगान है, देशभक्ति के गीत हैं, युद्ध के गीत हैं, क्रांति के गीत हैं। लेकिन क्या ऐसे गीत है, जो साधारण नागरिक से इतना भर कहे—सपने देखो, हार मत मानो, आगे बढ़ो, विश्वास रखों?

यही अमेरिका और बाकी दुनिया के बीच का सबसे बड़ा अंतर है। अधिकांश देशों ने अपने नागरिकों को इतिहास, धर्म, राजसत्ता, जातीय गौरव या राष्ट्रीय अस्मिता के आधार पर जोड़ा या बनाया। मगर अमेरिका ने वेयक्कित, निज सपनों से देश गढ़ा। अमेरिका में जो रहा है, जो हुआ या होगा, उसमें निज मनुष्य के सपनों की पहली भूमिका है फिर संविधान, प्रशासन, राष्ट्रपति की है। डोनाल्ड ट्रंप हों या इलॉन मस्क, कमला हैरिस हों या सुंदर पिचाई—सबकी कहानियों का आरंभ एक ही जगह से होता है—वह स्वतंत्र मनुष्य के सपने से है।

इसीलिए मुझे लगता है कि अमेरिका को समझना हो तो उसके राष्ट्रपतियों से पहले उसके गीतों को सुने। साफ जाहिर होगा कि वे अमेरिका कैसे सोचता है, कैसे टूटता है, कैसे संभलता है और क्यों हर संकट के बाद भी अपने भविष्य पर विश्वास बनाए रखता है।

अमेरिका का राष्ट्रगान “द स्टार स्पैंगल्ड बैनर” है। इसे 1814 में फ्रांसिस स्कॉट की ने बाल्टीमोर के युद्ध के दौरान लिखा था। इसकी सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है—“ओ’अर द लैंड ऑफ द फ्री एंड द होम ऑफ द ब्रेव”—यानी “स्वतंत्र लोगों की भूमि और वीरों का घर।” यह गीत युद्ध के बीच झंडे के बच जाने का गीत है। गणराज्य की रक्षा का गीत है। लेकिन अमेरिका और अमेरिकियों का सपना राष्ट्रगान में नहीं बसता। वह लोकप्रिय गीतों में सांस लेता है। यदि राष्ट्रगान बताता है कि अमेरिका कैसे बचा, तो उसके गीत बताते हैं कि अमेरिका किस विश्वास पर खड़ा हुआ था, खड़ा है और खड़ा रहेगा।

इसलिए अमेरिका भूगोल नहीं, बल्कि एक मानसिक अवस्था है। वह अपने नागरिकों से पहले यह नहीं पूछता कि तुम कौन हो, किस धर्म, किस जाति या किस वंश से आए हो। वह उनके सपने देखता है, सपनों को मौका देता है। इसलिए दुनिया भर के लोग ढाई सौ वर्षों से अपने सपने लेकर मुख्यतः अमेरिका की ओर ही भागे हैं। बिरले ही मनुष्य होंगे जो सपने लेकर चीन, रूस, भारत या किसी और देश में जाएं।

लोगों के लिए अमेरिका कमाई से पहले सपनों को साकार बनाने का मुकाम है। दुनिया के बाकी देश अपने को मदरलैंड, फादरलैंड या धर्मराष्ट्र कहते हैं, मगर अमेरिका अकेला ऐसा देश है, जहां सपना पहले है, बाकी सब बाद में। पहले सपना, फिर पूंजीवाद। कोलंबस जब समुद्र में निकला था, तब उसके पास कोई निश्चित नक्शा नहीं था। उसके पास केवल विश्वास था कि क्षितिज के पार कुछ नया मिलेगा। उसी खोज की मानसिकता ने बाद में पूरे अमेरिकी महाद्वीप का चरित्र गढ़ा। अमेरिका का जन्म किसी नस्ल विशेष, भाषा या धर्म से नहीं हुआ। उसका जन्म एक संभावना से हुआ जिसका संबल विश्वास था।

तभी अमेरिका सबसे बड़ा निर्यात हथियार से ज्यादा पूरी पृथ्वी को सपनों की और दौड़ाने वाला देश है। अमेरिकी संविधान का मूल भाव है कि यदि तुममें प्रतिभा है, जोखिम उठाने का साहस है और मेहनत करने की इच्छा है, तो भविष्य तुम्हारा हो सकता है। यही उसका मूल सूत्र और सांस्कृतिक ताकत है।

अमेरिका में राष्ट्रपति, सरकारें बदलती रहती हैं। नीतियां बदलती रहती हैं। कभी उदारवाद, कभी अनुदारवाद, कभी राष्ट्रवाद। कभी निक्सन और रीगन हैं, तो कभी ओबामा, कभी ट्रंप। लेकिन इन सबके बीच एक चीज़ लगातार है और वह यह विश्वास है कि हम कर सकते हैं, फिर महान बन सकते हैं, दुनिया का नेतृत्व कर सकते हैं और एक दिन चंद्रमा या मंगल पर भी बस सकते हैं।

वेयक्तिक सपने से कोई कब अमेरिका पहुंचता है और कैसे वही एक सपना अमेरिकी स्वप्न का रॉकेट बनता है और फिर वह दुनिया से लेकर अंतरिक्ष के मिशन में खरबपति और ब्रह्मांड का खोजी बन बैठता है—इसकी कहानी केवल इलॉन मस्क की नहीं है। यह अमेरिकी सभ्यता की तासीर है। तभी वहा का संगीतकार और गायक भी दुनिया को थिरकाता हैं तो अमेरिका में विश्वास का जज़्बा भी बनाए रखता हैं। अमेरिका की सांस्कृतिकता हो, उसका उपभोक्तावाद हो या उसका पूंजीवाद—सब व्यक्ति के सपनों से है। अब सपनों की यह फितरत तो होती ही कि वे सर्वभूमि गोपाल की तरह हर दिशा में फुदकते हैं।

तभी अमेरिका ने दुनिया को अपने सपनों में गूंथा है। मैंने पहली बार पेरिस के डिज़्नीलैंड में “इट्स ए स्मॉल वर्ल्ड” गीत सुना, तब गहराई से अहसास हुआ कि अमेरिका केवल सामान या हथियार नहीं बेचता, वह कल्पनाएं भी बेचता है। “इट्स ए स्मॉल वर्ल्ड” मनभावत, नौका यात्रा बताती है कि दुनिया छोटी है। लोग अलग-अलग दिखते हैं, लेकिन बच्चों की मुस्कान, भविष्य की आशा और मनुष्य के सपने हर जगह एक जैसे हैं। यह गीत शीतयुद्ध के दौर में बच्चों के लिए बना था, मगर तब भी वह अमेरिकी सॉफ्ट पावर का सांस्कृतिक घोषणापत्र था—दुनिया को जोड़ो, बांटो मत।

डिज़्नी का ही एक और मनभावन गीत है—“देयर्स अ ग्रेट बिग ब्यूटीफुल टुमारो”। भविष्य के प्रति अटूट विश्वास का यह संगीत और संदेश कहता है कि हर दिन के अंत में एक और बेहतर कल हमारा इंतजार कर रहा है। यही मनोविज्ञान विज्ञान, तकनीक, उद्योग और खोजों के पीछे है। भविष्य अतीत से बड़ा होगा। और अगली पीढ़ी पिछली पीढ़ी से बेहतर जीवन जिएगी।

अमेरिकी सपनों ने केवल हॉलीवुड नहीं बनाया। उसने दुनिया को ज्ञान, विज्ञान और तकनीक भी दी। एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई भी सपने, विश्वास की उपज हैं। अमेरिका ने डॉलर को वैश्विक करेसी बनाया तो दुनिया को सपने देखने की भाषा भी दी। उसकी फिल्में, उसका संगीत, उसके विश्वविद्यालय, उसकी तकनीक, उसके बाजार—सब मिलकर एक ही संदेश देते है सपने देखो, भागों, दौडों, कंपीट करों और भविष्य बनाओ।

अमेरिका की वास्तविक शक्ति व्हाइट हाउस नहीं है। वह उन करोड़ों लोगों के दिल और दिमाग में बसने वाली उस धुन और विश्वास में है, जो लोगों को सुबह यह मानकर उठाती हैं कि आज का दिन कल से बेहतर हो सकता है।

तभी एक मायने में पिछले पचास वर्षों का अमेरिकी संगीत अमेरिका की जीवनी है। “बॉर्न टू रन” कहता है—सीमाएं तोड़ो और आगे बढ़ो। “डोंट स्टॉप बिलीविन” कहता है—विश्वास मत खोओ। “देयर्स अ ग्रेट बिग ब्यूटीफुल टुमारो” कहता है—भविष्य पर भरोसा रखो। “इट्स ए स्मॉल वर्ल्ड” कहता है—दुनिया एक साझा मानव परिवार है। इन्ही सबसे अमेरिकी समाज की आत्मा है।

तो भारत के हम लोगों के लिए इसका क्या अर्थ है? नोट करें अंधविश्वास और अवतारों में जीना हर देश, नस्ल, कौम, धर्म और अंततः मनुष्य की बरबादी का रास्ता है। देश न भाषणों, झूठ और सेनाओं से बनता है और न अफसरों या खरबपतियों से विकास बनता है। सभ्यताओं का विकास मनुष्यों के स्वतंत्र सपनों से होता है। और वे सपने तभी खिलते हैं, जब व्यक्ति, होमो सेपियंस, इस विश्वास के साथ जीए कि वह अपनी नियति स्वयं बदल सकता है।

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