हाल में 143 देशों के लोगों के ‘आनंद’, ‘खुशी’, ‘प्रसन्नता’ की तुलना वाली वैश्विक रिपोर्ट आई। वर्ष 2024–2025 की तस्वीर थी। क्या है तस्वीर? वही जो दुनिया दस वर्षों से लगातार देख-सुन रही है! मतलब फ़िनलैंड लगातार आठ-नौ वर्षों से खुशियों, प्रसन्नता का नंबर एक स्वर्ग। उसके बाद के दस में से बाकी नौ डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे, आइसलैंड यानी स्कैंडिनेविया के “नॉर्डिक मॉडल” वाले देश हैं। फिर उसी जैसे नीदरलैंड, लक्ज़मबर्ग, स्विट्ज़रलैंड। सूची में इज़राइल भी है। यह कुछ हैरानी वाली बात इसलिए है क्योंकि वहां के लोग 2024–25 में तो हमास से गाज़ा में लड़ते हुए थे। पर शायद इज़राइली, यहूदी इसलिए खुश होंगे क्योंकि उन्होंने हमास-फ़िलिस्तीनियों का दरबदर किया तो विजेता भाव की खुशी!
गंभीर सत्य एंग्लोस्फीयर देशों यानी अमेरिका, ब्रिटेन जैसी अंग्रेज़ीभाषी दुनिया के लोगों की ‘प्रसन्नता’ के घटने का है। भारत और हम भारत के लोगों के आनंद पर भला क्या सोचना। दिल्ली में एक लोकोक्ति है- सारे दुखिया जमना पार। वैसे ही विश्व का यह आम सत्य है- सारे दुखिया मध्य एशिया पार! मतलब, पृथ्वी के सारे दुखिया कांधार-सिंधु पार, पूरा दक्षिण एशिया (भूटान अलग)! भारत की 140 करोड़ लोगों की आबादी नरक देशों (जैसे अफ़गानिस्तान, ज़िम्बाब्वे, सिएरा लियोन, लेबनान, यमन) से हल्की सी ऊपर 116वें स्थान पर है!
और ऐसा केकड़ा छाप राजनीति से है! केकड़ा कमाल का जीव होता है! उसकी बेसिक प्रकृति-प्रवृत्ति एक-दूसरे को नीचे खींचना है! केकड़ों को एक टोकरी में रख दें तो सब एक-दूसरे पर चढ़ने, एक-दूसरे को नीचे खींचने की आक्रामकता दिखाएंगे। कुछ प्रजातियां तो एक-दूसरे को खाती (cannibalistic) भी हैं। नतीजतन कोई भी बाहर नहीं निकल पाता, प्रसन्न नहीं हो सकता। पूरी टोकरी दुखों का नरक! गौर करें ट्रंपकालीन आज के अमेरिका पर? गौर करें ब्रेक्ज़िट से बाहर निकले ब्रिटेन की राष्ट्रवादी टोकरी पर। गौर करें मोदीकालीन राष्ट्रवादी भारत पर! इन सभी देशों की राजनीति ने समाज को एक टोकरी में बदला है। ऐसी टोकरी, जिसमें या तो मेढ़क की टर्र-टर्र, विश्वगुरु का इलहामी आलाप या केकड़ों की प्रतिस्पर्धा है। तब भला सफलता, खुशी, आनंद, ‘प्रसन्नता’ कैसे संभव? ले देकर एक-दूसरे को मात देने, टांग खिंचाई और दुबले, मोटे, नए-पुराने सभी केकड़ों का शोर, एक-दूसरे को मारने, गाली देने, जेल में डालने का वह भौकाल, वह झूठ, वह लूट मानो नरक के खौलते कड़ाह में उछलना ही जीने का उपाय है।
ऐसा रत्ती भर स्कैंडिनेवियाई देशों में नहीं है। राजनीति है, पर वह मनुष्यों की है, केकड़ों की नहीं!
मैंने दिसंबर 1976 से लिखना (राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में) शुरू किया। वह विश्व राजनीति से ही लिखने की शुरुआत थी। तब से आज तक के पचास वर्षों में सचमुच मैंने कभी भी स्कैंडिनेविया देशों यानी फ़िनलैंड, डेनमार्क, आइसलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और यूरोप के उन जैसे नीदरलैंड, लक्ज़मबर्ग, स्विट्ज़रलैंड में राजनीति का न शोर सुना, न पढ़ा और न लिखा! इन देशों के नागरिकों का प्रसन्नता में जीना इसलिए है क्योंकि इन्होंने केकड़ा छाप राजनीति तथा टोकरी-बाड़े का जीवन पाया ही नहीं। मतलब जैसे अमेरिका ने ट्रंप (पहले भी कई बार) के भौकाल में “अमेरिका फर्स्ट” या “वैश्विक महाशक्ति” के शोर अनुभव किए, अहंकार (अंततः तानाशाही) पाले तो उससे अमेरिकियों को बांटने, तेरा-मेरा, केकड़ा प्रतिस्पर्धा, जीवन को तमाम तरह की चिंताओं में डालने की विकृतियां अपने आप बनती-बढ़ती-घटती गईं।
सोचें, डोनाल्ड ट्रंप पर। सियासी शोर से अमेरिका को कैसा टोकरी का देश बना दिया है। टोकरी के भीतर निर्वाचित राष्ट्रपति देश की, अपने पूर्ववर्ती की, विरोधी पार्टी की हर रोज टांग खींचता है। कलह ही कलह है। सो, वह लोकतंत्र का टापू है या केकड़ों की खींचतान का पैमाना। अंदरूनी राजनीति में गला घोंट प्रतिस्पर्धा तो विश्व राजनीति में महाशक्ति के अहंकार में बाकी देशों को लात मार रहा है या लात खा रहा है। अमेरिका अंदर, बाहर दोनों में केकड़ा राजनीति का आज प्रतीक है। तभी 2024–2025 में पहली बार देश प्रसन्नता सूची में टॉप बीस देशों में नहीं है। भले अमीरी में फूला हुआ है।
राजनीति फ़िनलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क, नीदरलैंड यानी दुनिया के प्रसन्न देशों में भी है। पर केकड़ाई प्रतिस्पर्धा नहीं। सब है पर इस समझदारी के साथ कि मानव यात्रा की कुल प्राप्ति का कुल सुख तभी है जब बिना शोर, बिना गला काट के मौन जीना है। मनुष्य को मनुष्य पर विश्वास करना है। टांग नहीं खींचना, मारना नहीं बल्कि एक-दूसरे को सहारा देते हुए ऊपर उठाना है।
फ़िनलैंड, स्वीडन में नेता इस भाव में जीते हैं कि चलो कॉफी-हाउस में बैठें। आज पत्र-पत्रिकाओं में जो छपा, उस पर बात करें, बहस करें। मतलब वह चौपाल, वह सार्वजनिक पंचायत, अड्डेबाज़ी जिसमें सब बैठें, सभी अपने विचार स्वतंत्र रूप से रखें, दूसरों के तर्कों को परखें और फैसले-निर्णय की ज़ोर जबरदस्ती या प्रोपेगेंडा से नहीं, बल्कि तर्क के दम से मुद्दों का सत्य निकाले। तब यदि लगे कि लोकहित में फलां में दम है तो तू बन सरपंच। तुझे देखते हैं, मौका देते हैं और नया सरपंच यदि अपने कहे को सही साबित कर सफल हो तो बहुत अच्छा, तालियां बजाओ। और सफल नहीं हुआ तो कोई बात नहीं वह खुद ही चौपाल पर मान ले और नया सरपंच काम संभाले।
हाल में 96 वर्ष के जर्मन दार्शनिक युर्गेन हाबर्मास की मृत्यु हुई। यह दार्शनिक उम्र भर इस सोच में खफा रहे कि कॉफी-हाउस कभी यूरोप में लोकतंत्र की प्रयोगशाला थे। वहां सत्ता बाहर थी और विचार भीतर। (ऐसा भारत के संदर्भ में मैंने दिल्ली के एक कॉफी हाउस के किस्से सुने हैं। दिल्ली में आज कनॉट प्लेस के पालिका बाजार-पार्क का जो इलाका है वहां 60–70 के दशक में बड़ा खुला कॉफी हाउस था। तमाम तरह के नेताओं में विचारों की बहस, अड्डेबाज़ी का ठिकाना। ऐसे ही कोलकाता के कॉफी हाउस के किस्से हैं।) कॉफी हाउस मतलब बिना सत्ता के या किसी भी तरह के भय के निर्भीकता से बात हो, संवाद हो, सामूहिक चौपाल हो और सत्य समझा जाए।
युर्गेन हाबर्मास के अनुसार जैसे-जैसे आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य विकसित हुए वैसे ही कॉफी हाउस का उन्मुक्त, खुला माहौल उखड़ता, खत्म हुआ। संवाद ही नहीं रहा। राजनीतिक दलों और व्यावसायिक मीडिया ने इस सार्वजनिक क्षेत्र पर कब्ज़ा किया। संवाद की जगह प्रतिनिधित्व ने ले ली और नागरिक धीरे-धीरे सक्रिय भागीदार से निष्क्रिय दर्शक में बदल गए। हाबर्मास ने इस परिवर्तन को “पुनः सामंतीकरण” का नाम दिया है। अर्थात सार्वजनिक क्षेत्र फिर से प्रभावशाली समूहों, सामंतों के नियंत्रण में चला गया।
दूसरे शब्दों में केकड़ों के नियंत्रण में। और केकड़ों की टांग खिंचाई में रचा-बसा लोकतंत्र। तभी दुनिया के जिन देशों ने लोकतंत्र की आड़ में समाज गढ़ा उनमें “आदर्श संवाद-स्थिति” के कॉफी हाउस या चौपाली बैठक को खत्म कर झूठ, प्रोपेगेंडा तथा कार्यपालिका के नौकरशाही नियंत्रणों में देश को ही केकड़ों की टोकरी बना डाला। तब संभव ही नहीं जो ऐसे देशों में लोग आनंद में जी सकें। अपने को सहज, सरल, स्वस्थ बना प्रसन्नता का जीवन जिएं।
दुनिया के टॉप दस खुश देशों और शेष दुनिया का फर्क आकाश-पाताल सा है। इनका आनंद इस बात में है कि कोई छोटा-बड़ा नहीं है। कोई भूखा नहीं, कोई भयाकुल नहीं है और न कोई झूठों का भक्त। सोचें, हाल में ट्रंप ने ग्रीनलैंड को कब्जाने का कैसा शोर बनाया। तब जवाब में डेनमार्क की विदेश नीति, उसके नेताओं, नॉर्डिक देशों की बिरादरी का व्यवहार कैसा था? अमेरिका के आगे शक्तिविहीन होते हुए भी डेनमार्क घबराया नहीं। उसने यूरोपीय संघ और ट्रंप से संवाद बनाया। और स्विट्ज़रलैंड के दावोस की चौपाल में अपना वह तर्क, वह संवाद बनाया जो ट्रंप ने वही इरादा बदला!
ऐसी ही अंदरूनी राजनीति में भी नॉर्डिक देशों के लोगों की तासीर है। पिछले पचास वर्षों में फरवरी 1986 की एक अकेली ऐसी घटना है, जिस पर मैं चौंका थी। वह थी सिनेमा देखकर बिना सुरक्षां के पैदल लौट रहे प्रधानमंत्री ओलोफ़ पाल्मे की हत्या की घटना। पूरी दुनिया तब चौंकी थी। पर ऐसा होना केकड़ा राजनीति से नहीं था। पाल्मे तब अमेरिका, इज़राइल के आलोचक थे। इसे नापसंद करते हुए एक व्यक्ति ने चलते-चलाते पाल्मे की हत्या कर दी। एक तरह से वह वैश्विक राजनीति के घरेलू माहौल में एक व्यक्ति की मन ही मन बनाई या पाली शत्रुता थी।
सोचें, प्रधानमंत्री वहां आम नागरिक की तरह सिनेमा देखता और घूमता हुआ होता है। इन देशों का प्रधानमंत्री (राजा) अपने घर को तीर्थ घोषित कर लोगों को अपना भक्त नहीं बनाता। इन देशों में प्रधानमंत्री या सरकार-व्यवस्था से लेकर नागरिक सब सहज मनुष्य जीवन जीते हैं। न छप्पन इंची छाती और न भक्त या दुश्मन का जीवन। इन देशों के राजनीतिक दलों में कभी ऐसी शत्रुता नहीं रही, जैसी अमेरिका, भारत या दुनिया के दुखी देशों की केकड़ा राजनीति की आम टांग खिंचाई है। मोटा सवाल है भारत क्यों दुखियों का संसार है? इसलिए क्योंकि अहंकार अपने को विश्वगुरु कहलाने का है जबकि हैं अंगूठा छाप। हां, ऐसे देश को कैसे शिक्षित करार दिया जा सकता है, जिसमें कोई मौलिक रचना, प्राप्ति ही नहीं, सब कुछ जुगाड़ से है।
सोचें, प्रसन्नता से जीवन जीने वाले टॉप के सभी दस देश अपनी-अपनी मूल भाषा (बहुत कम आबादी में बोली जाने वाली मातृभाषा) में पढ़ते हैं और शिक्षित हैं। अंग्रेज़ी नहीं आती। बावजूद इसके सभी मौलिक सृजक हैं। ज्ञान-विज्ञान, शोध, तकनीक, कला, साहित्य सबमें शोध, सृजन की मौलिकता लिए हुए हैं। इन तमाम विषयों में दुनिया को नोबेल पुरस्कार बांटते हैं। इन देशों की दवा कंपनियों से दुनिया की सेहत बनी है। विश्व आर्थिकी बनी है। शिपिंग-कंटेनर कंपनी Maersk से लेकर लेगो (खिलौना कंपनी), नोकिया, आईकिया, वोल्वो, डीकोड जेनेटिक्स जैसी कोई दो दर्जन बहुराष्ट्रीय कंपनियां दुनिया की प्रतिमान हैं। ध्यान रहे इनके आगे अंबानी-अडानी की व्यापारिक दुकानों का शून्य अर्थ है। और यह भी मानें अपने खरबपति भले अपने को जगत सेठ मानें लेकिन ये भी इतिहास के जगत सेठ जैसे दुखिया हैं, सुखिया नहीं! आखिर टोकरी की केकड़ा छाप राजनीति में भला कोई सुखी कैसे रह सकता है!
