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बारह साल का मेकअप, पर नया क्या?

New Delhi, Nov 26 (ANI): Prime Minister Narendra Modi speaks during the virtual inauguration of the Safran Aircraft Engine Services India (SAESI) facility located at the GMR Aerospace and Industrial Park – SEZ, at Hyderabad, in New Delhi on Wednesday. (ANI Video Grab)

भारत बदल गया है। कम से कम पिछले बारह वर्षों से यही कथा सुनाई जा रही है। बदलाव भी बड़े पैमाने पर, तेज़ी से और लगभग हर दिन। 2026 का भारत नए संसद भवन वाला भारत है। उसके राजमार्ग चौड़े हो रहे हैं। एक्सप्रेसवे बढ़ रहे हैं। जिन शहरों में कभी हवाई अड्डे नहीं थे, वहाँ अब विमान उतर रहे हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा मिल रहा है। ट्रैफिक पुलिस वातानुकूलित हेलमेट पहन रही है। देश पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष मिशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और ओलंपिक खेलों की बात करता है। फोन अधिक स्मार्ट और सुलभ हो गए हैं। चुनाव अधिक महंगे हो गए हैं। राष्ट्रवाद अधिक मुखर है। महत्वाकांक्षाएँ कहीं बड़ी हैं। नए नारे हैं, नए प्रतीक हैं, नए अभियान हैं।

सब मिलकर “नया भारत” रच रहे हैं। यह जुमला इतनी बार दोहराया गया है कि “नया” अब विशेषण कम और शासन-दर्शन अधिक लगता है।

लेकिन विकास के इस पूरे ढाँचे के नीचे कुछ अजीब तरह से सबकुछ परिचित भी दिखाई देता है।

जिस भारत को पत्रकार-संपादिक फ्रैंक मोरेस ने आधी सदी तक देखा, जिस भारत पर खुशवंत सिंह ने अपने स्तंभ ‘विद मैलिस टुवर्ड्स वन एंड ऑल’ कॉलम में निर्मम व्यंग्य किया, और जिस भारत को हरिशंकर परसाई ने अपनी रचनाओं में उधेड़ा, वह कहीं गया नहीं है। वह जस का तस है।
फ्रैंक मोरेस उस लोकतंत्र को लेकर चिंतित थे जो अपनी सरकार को जवाबदेह नहीं बना पाता था। खुशवंत सिंह सामाजिक पाखंड और बाबा उद्योग पर हँसते थे। परसाई ने उस भ्रष्ट सिपाही की कहानी लिखी थी जिसे चाँद पर भेज दिया जाए तो वह वहाँ भी भ्रष्टाचार शुरू कर देगा। उन्हें समझ था कि भारतीय अव्यवस्था, व्यवस्था की विफलता नहीं बल्कि मानों उसकी कार्यप्रणाली का हिस्सा या उसमें अंतरनिहित हो।

चालीस-पचास साल पहले लिखे गए भारत सत्य को आज पढ़े तो लगता है वे इतिहास नहीं, सटीक समकालीन टिप्पणी हैं। व्यंग्य नहीं, आईना हैं।

यहीं से नरेंद्र मोदी के बारह वर्षों का सबसे असहज प्रश्न जन्म लेता है। भारत बातों में, तकनीक में जितनी तेज़ी से आगे बढ़ता है, क्या स्वभाव में भी वह उतनी ही तेजी से बदलता है? क्या नया संसद भवन, सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाएँ वास्तविक परिवर्तन हैं, या फिर वे उसी कहानी का अधिक परिष्कृत संस्करण हैं जिसे परसाई जीवन भर लिखते रहे — एक ऐसा गणराज्य जो काँपता है, प्रदर्शन करता है और फिर आगे बढ़ जाता है?

शायद मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि और सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास यही है। उन्होंने भारत के आत्मबोध को बदल दिया, लेकिन भारतीय जीवन की अनेक मूल स्थितियों को उतना नहीं बदल पाए।

यह विरोधाभास सबसे स्पष्ट भारत की आध्यात्मिक कल्पना, चिंतन-मनन में दिखाई देता है।

पचाल, साठ और सत्तर के दशक का भारत जिद्दू कृष्णमूर्ति को जन्म देता है। एक ऐसा व्यक्ति जिसने शिष्यों से दूरी बनाई, अपना संगठन भंग कर दिया और अनुयायियों से कहा कि समस्या गुरु नहीं, गुरु की आवश्यकता है। सत्तर और अस्सी के दशक का भारत ओशो को जन्म देता है। विवादास्पद, उत्तेजक, असुविधाजनक। ऐसा व्यक्ति जिसने विरोधाभासों और विलासिता को विचारोत्तेजक औजार की तरह इस्तेमाल किया। दोनों में अनेक सीमाएँ थीं, लेकिन दोनों समाज के साथ रचनात्मक टकराव में मौजूद थे। वे प्रश्न पूछते थे। बेचैन करते थे। आत्मसमर्पण आसान नहीं होने देते थे।

आज का भारत बागेश्वर धाम जैसी घटनाओं को पैदा करता है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस वातावरण की कहानी है जिसने समझ लिया है कि भक्ति का अभ्यस्त समाज किसी दूसरी दिशा में भी आसानी से मोड़ा जा सकता है। श्रद्धा और अनुपालन (कम्प्लायंस) के बीच की दूरी उतनी बड़ी नहीं होती जितनी दिखाई देती है। टेलीविजन-अनुकूल, सोशल मीडिया-अनुकूल, राजनीतिक रूप से पठनीय और वैचारिक रूप से सरल, यह धार्मिक क्षेत्र में काम करता हुआ एक डिजिटल जन-प्रभाव मॉडल है।

यही वह संरचना है जो पिछले बारह वर्षों में सड़कों और हवाई अड्डों के साथ-साथ खड़ी हुई है। केवल कंक्रीट और स्टील का बुनियादी ढाँचा नहीं, बल्कि आस्था का भी एक नया बुनियादी ढाँचा। ऐसी धार्मिकता जो प्रबंधित है, सत्ता के समीप है और राजनीतिक रूप से उपयोगी है। उसने उस अनियंत्रित, प्रश्नाकुल और कभी-कभी असुविधाजनक आध्यात्मिक ऊर्जा की जगह लेना शुरू किया है जिसे भारत कभी प्रचुर मात्रा में पैदा करता था। आज के भारत में कृष्णमूर्ति बेमतलब होते। शायद आमंत्रित भी न किए जाते।

इसी संदर्भ में राम मंदिर को देखना चाहिए। संभवतः यह मोदी युग की सबसे बड़ी राजनीतिक और सांस्कृतिक उपलब्धि है। राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ी भावना, उसकी राजनीति पर चाहे जो राय हो, मूलतः धार्मिक थी। करोड़ों लोगों को लगता था कि उनसे कुछ पवित्र छीन लिया गया है। वह भावना वास्तविक थी, भले उसका राजनीतिक उपयोग हुआ हो।

लेकिन मंदिर आज जिस रूप में उपस्थित है, वह अधिक जटिल है। प्राण प्रतिष्ठा का क्षण कई बार आध्यात्मिक आयोजन से अधिक राजनीतिक प्रदर्शन (पॉलिटिकल स्पेक्टेकल) जैसा लगा। उसके आसपास की भाषा में भक्ति से अधिक विजय का भाव दिखाई दिया। एक ऐसा मंदिर जो सभ्यतागत आत्मविश्वास का प्रतीक बन सकता था, कई बार राजनीतिक हिसाब-किताब का स्मारक बन गया। राम नैतिक आदर्श से अधिक राजनीतिक प्रतीक में बदलते दिखाई दिए।

पिछले बारह वर्षों में भारतीय राजनीति ने केवल धर्म का उपयोग नहीं किया, उसने उसकी बनावट भी बदली है। जो कभी भक्ति थी, व्यक्ति और उसके ईश्वर के बीच का निजी संवाद, वह धीरे-धीरे अंधभक्ति में बदलती दिखाई देती है। ऐसी निष्ठा जो जाति, वर्ग और शिक्षा की सीमाएँ आसानी से पार कर जाती है।

फिर भी निष्पक्षता की माँग है कि उपलब्धियों को स्वीकार किया जाए। सड़कें बेहतर हुई हैं। भारत आज वैश्विक मंचों पर पहले से अधिक दिखाई देता है। जी-20 शिखर सम्मेलन, चंद्रयान-3 की सफलता, अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण, और नक्सलवाद के खिलाफ लंबा अभियान — इन सबमें संगठनात्मक महत्वाकांक्षा और राजनीतिक इच्छाशक्ति स्पष्ट दिखाई देती है। मोदी ने एक ऐसे देश को, जो लंबे समय तक स्वयं को लेकर संकोच करता रहा, आत्मविश्वास दिया। यह छोटी उपलब्धि नहीं है।

लेकिन परसाई शायद हँसते हुए पूछते कि इसकी कीमत क्या चुकाई गई?

जब नागरिक और राज्य के बीच की पूरी जगह प्रदर्शन (स्पेक्टेकल) से भर जाए तो सभ्यता क्या खोती है? जब असुविधाजनक प्रश्न पूछने वाले लोग — संत, दार्शनिक, व्यंग्यकार — धीरे-धीरे ऐसे चेहरों से बदल दिए जाएँ जो प्रश्न पूछने का अभिनय तो करते हैं, पर वास्तव में कोई कठिन प्रश्न उठाते नहीं?

2026 का भारत अब भी उन अनेक समस्याओं से जूझ रहा है जो स्वतंत्रता के समय से उसके साथ हैं। डबल इंजन सरकारों और नए भारत की भाषा के बावजूद पानी की कमी, बिजली कटौती, परीक्षा पत्र लीक और प्रशासनिक अव्यवस्था करोड़ों लोगों की रोज़मर्रा की वास्तविकता हैं। प्रधानमंत्री कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), इलेक्ट्रिक वाहनों (इलेक्ट्रिक व्हीकल्स) और विश्वगुरु बनने की बात करते हैं, जबकि सामान्य नागरिक अक्सर मूलभूत सेवाओं के लिए संघर्ष करता है।

लेकिन सबसे बड़ा परिवर्तन शायद कहीं और हुआ है।

आपातकाल ने स्वयं को घोषित किया था। सब जानते थे कि स्वतंत्रता सीमित की गई है। आज की अनुरूपता (कनफॉर्मिटी) वैसी नहीं है। वह धुंध की तरह फैलती है। धीरे-धीरे। बिना घोषणा के। इतनी सामान्य कि कई बार सामान्य जीवन ही लगने लगती है।

बारह वर्ष पहले नरेंद्र मोदी व्यवस्था को ठीक करने के वादे के साथ आए थे। लेकिन उन्होंने उससे भी अधिक उल्लेखनीय काम किया। उन्होंने करोड़ों लोगों को विश्वास दिलाया कि व्यवस्था टूटी हुई नहीं थी। समस्या केवल उसे चलाने वालों में थी। संरचना में नहीं।

यह असाधारण राजनीतिक सफलता है।

और साथ ही राजनीति की सबसे पुरानी युक्तियों में से एक भी।

परसाई ने इस पर लिखा था। खुशवंत सिंह इस पर हँसे थे। फ्रैंक मोरेस ने इसे प्रथम पृष्ठ (फ्रंट पेज) की खबर की तरह दर्ज किया था और फिर उसे घटित होते देखा था।

वे अब नहीं हैं।

लेकिन गणराज्य के बहाने जीवित हैं। केवल उनका ब्रांड बदल गया है।

हाँ, भारत बारह वर्षों में बदला है। ढाँचा नया है। नारे नए हैं। देवता अधिक टेलीविजन-अनुकूल (टेलीजेनिक) हो गए हैं। और शायद इन बारह वर्षों में लोकतंत्र शब्द का अर्थ भी चुपचाप बदल गया है। वह जवाबदेही की व्यवस्था या अधिकारों की गारंटी से अधिक एक कारोबार (बिज़नेस) जैसा दिखने लगा है। और हर सफल कारोबार की तरह उसने अपने सबसे भरोसेमंद ग्राहक भी खोज लिए हैं।

किसान, छात्र, नौकरी तलाशता युवा, राशन या प्रमाणपत्र की कतार में खड़ा नागरिक — वे अब भी वहीं हैं जहाँ इस गणराज्य ने उन्हें अक्सर छोड़ा है। एक ऐसी कंपनी के हिस्सेदार, जिसने उनसे निवेश तो लिया, लेकिन लाभांश बहुत कम लौटाया।

आज परसाई या मोरेस को पढ़िए तो समझ में आता है कि दाँव पर कभी केवल सड़कें या हवाई अड्डे नहीं थे। दाँव पर वह लोकतंत्र था जो अपनी सरकार से जवाब माँग सके। जो शोर और विमर्श में फर्क कर सके। भावना और विचार में भेद कर सके। प्रदर्शन (स्पेक्टेकल) और सार (सब्स्टेंस) के बीच अंतर पहचान सके।

2026 का भारत नया भारत बन चुका है।

कहानी फिर भी बहुत पुरानी है।

फर्क बस इतना है कि इस बार उसकी प्रस्तुति (प्रोडक्शन वैल्यू) कहीं बेहतर है।

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