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जनता संयम करें, सत्ता उड़ान भरे!

तो अब जनता के लिए संयम का समय है। 10 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुपचाप परदा हटा दिया। असलियत सामने आई। देशवासियों से कहा गया—विदेश यात्राएं टालिए, ईंधन-तेल कम खर्च कीजिए, गाड़ियां साझा कीजिए, घर से काम कीजिए। हमेशा की तरह भाषा सधी हुई थी। आवाज में चिंता थी, ठहराव था, और तकलीफों पर हल्का-सा राष्ट्रवाद चढ़ा हुआ था। संदेश साफ था, संकट आया है तो जनता अपनी कमर कसे, देशभक्ति दिखाएं, त्याग को तैयार रहे!

हैदराबाद के भाषण ने केवल यह नहीं बताया कि भारत संकट के दौर में है। भाषण ने वास्तव में कुछ और उजागर किया। यह कि भारत में व्यवस्था पर दबाव बढ़ने पर बोझ उठाने की अपेक्षा आखिर किससे की जाती है? केवल आम लोगों से। देश से धीरे-धीरे कहा जा रहा है कि कम खर्च करो, कम यात्रा करो, कम उम्मीद रखो, और इस समायोजन को देशभक्ति समझो। प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भरता का जुमला बोला और कहा कि भारत का भविष्य “रोजमर्रा के जीवन में लिए गए सचेत निर्णयों” से तय होगा।

लेकिन किसके रोजमर्रा के जीवन से?

निश्चित रूप से कॉरपोरेट भारत से नहीं, जिसकी विदेशी कॉन्फ्रेंस, एग्जीक्यूटिव रिट्रीट और विदेश यात्राएं संयम की अपील से अप्रभावित हैं। उस अरबपति वर्ग से नहीं, जिसकी संपत्ति पिछले दशक के लगभग हर संकट के साथ बढ़ी है, जबकि शीर्ष एक प्रतिशत आबादी अब देश की 40 प्रतिशत से अधिक संपत्ति पर नियंत्रण रखती है। उन मंत्रियों से भी नहीं, जिनके विदेश जाने वाले प्रतिनिधिमंडल सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करते हैं और फिर चुपचाप सार्वजनिक चर्चा से गायब हो जाते हैं।

निश्चित ही स्वयं प्रधानमंत्री से भी नहीं। नागरिकों से विदेश यात्राओं पर पुनर्विचार करने की अपील के बाद नरेंद्र मोदी यूरोप और खाड़ी देशों की बहुदेशीय यात्रा पर निकल पड़े—नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, इटली और यूएई। व्यापार, ऊर्जा और सहयोग पर वे बातचीतें, जो सरकार की अपनी डिजिटल दक्षता और वर्क फ्रॉम होम वाली भाषा के अनुसार, उन्हीं वीडियो कॉन्फ्रेंसों पर भी हो सकती थीं जिनकी सलाह देश को दी गई थी।

यह विरोधाभास संयोग नहीं है। यह व्यवस्था की बनावट में मौजूद है। प्रस्तावित त्याग कभी सचमुच राष्ट्रीय नहीं होता। वह नीचे की ओर निर्देशित रहता है—मध्यवर्ग, निम्न मध्यवर्ग, किसान, वेतनभोगी परिवार और छोटे व्यापारी की ओर। उस भारत की ओर, जो व्यवस्था में दरार पड़ते ही सबसे पहले खर्चे बांधता है। उन भारतीयों की ओर, जिनके लिए सोना विलासिता नहीं, सुरक्षा है। किसी नीति-निर्माता को सोना केवल आभूषण या राष्ट्रीय हित में टाली जा सकने वाली वस्तु लग सकती है। लेकिन भारत में लोग सोने को आर्थिक रिपोर्ट की तरह नहीं देखते। फसल से पहले वही गिरवी रखते हैं। जिन परिवारों में बेटियों के हिस्से कुछ और नहीं आता, वहां वही उनका उत्तराधिकार होता है। स्थिर वित्तीय ढांचे से बाहर करोड़ों लोगों के लिए वही उस सामाजिक सुरक्षा का सबसे निकट विकल्प है, जिसे भारत गणराज्य कभी बना नहीं सका। परिवारों से सोना खरीद टालने को कहना केवल आर्थिक अपील नहीं है। यह उनसे उस सुरक्षा जाल को स्थगित करने को कहना है, जिसे उपलब्ध कराने में राज्य विफल रहा है।

शायद यही आधुनिक भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी कुशलता या बेईमानी है। अपनी आर्थिक गड़बड़ियों और असुरक्षा को जनता की नैतिक जिम्मेदारी करार दो। संस्थागत सहारा जितना कमजोर होता है, त्याग की भाषा उतनी ऊंची हो जाती है। नागरिकों से अब केवल अस्थिरता झेलने की अपेक्षा नहीं की जाती। उनसे उसे नैतिक गरिमा के साथ झेलने की अपेक्षा की जाती है। इसलिए इसके बाद जो दृश्य सामने आया, वह संयोग कम और खुलासा अधिक लगा।

नागरिकों से संयम, त्याग और कम उपभोग की अपील के चौबीस घंटे भी पूरे नहीं हुए थे कि गुजरात प्रदर्शन की तैयारी में जुटा हुआ था। प्रधानमंत्री मोदी का भव्य रोड शो सोमनाथ से गुजरा। काफिले, भीड़, भगवा झंडे, डेढ़ किलोमीटर तक खड़े कलाकार और मंदिर नगरी से गुजरता योजनाबद्ध विजय प्रदर्शन। सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार के 75 वर्ष पूरे होने पर भारतीय वायुसेना की सूर्य किरण एरोबैटिक टीम के छह हॉक एमके-132 विमानों ने अरब सागर के ऊपर केसरिया, सफेद और हरे रंग की लकीरें खींचीं।

फिर वडोदरा में दूसरा रोड शो, दूसरा उद्घाटन, शक्ति का एक और सार्वजनिक प्रदर्शन। दो दिन में तीन शहर। छह लड़ाकू विमान। दो रोड शो। लेकिन वहां किसी ने संयम की बात नहीं की। मीडिया में कोई यह हिसाब नहीं लगा रहा था कि काफिलों, विमानों और पूरे तमाशे में कितना ईंधन खर्च हुआ।

हैदराबाद भाषण में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात वह नहीं थी जो कही गई। बल्कि वह थी, जिसे कहना अब जरूरी नहीं समझा गया। विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव क्यों है, इसका कोई स्पष्ट हिसाब नहीं दिया गया। वर्षों से टाले गए संरचनात्मक सुधारों पर कोई आत्ममंथन नहीं हुआ। आत्मनिर्भरता के दावों के बावजूद भारत वैश्विक झटकों के प्रति कितना संवेदनशील बना हुआ है, इसका कोई ईमानदार स्वीकार नहीं था। आखिर सरकार का बिल आपके खाने की मेज पर नहीं पहुंचता। आपका पहुंचता है। यही वह नई कारीगरी है जिसने भारत में पुराने सामाजिक अनुबंध की जगह ले ली है। गणराज्य का पुराना वादा कठिन था, लेकिन स्पष्ट था—आप राज्य को अपना वोट, टैक्स और भरोसा देते हैं तो बदले में सरकार से अपेक्षा होती है कि संकट घर तक पहुंचने से पहले उसे सरकार अपने भीतर सोख ले।

आज का नया इंतजाम अलग है। आप सरकार को अपना वोट दें, उसे जिताएं, टैक्स और विश्वास भी दें, लेकिन जब अर्थव्यवस्था कमजोर पड़े या संकट आए, तब अपनी ही कमर कस लीजिए। खर्च घटाइए। अपनी सुरक्षा तक टाल दीजिए। महीने का बजट थोड़ा और खींचिए, जबकि प्रधानमंत्री, मंत्री और सरकार चमचमाते मंचों से अपने तमाशे करते रहें।

इसलिए एक तरफ वह कॉरपोरेट वर्ग है, जिसकी विदेश यात्रा का बजट मध्यवर्ग के सिकुड़ने के साथ भी बढ़ता रहता है। आखिर वे अरबपति हैं, जिनकी संपत्ति हर संकट के साथ और बढ़ती गई। फिर वह राजनीतिक प्रतिष्ठान है, जिसके रोड शो, एयर शो और विदेशी दौरों की भूख जनता के पैसे पर बेखटके चलती है। उस पर मितव्ययिता की कोई सीमा लागू नहीं होती। दूसरी ओर वह बेरोजगार स्नातक है जिसे नौकरी नहीं मिल रही, वह परिवार है जो कर्ज को अगले महीने तक घसीट रहा है, वह किसान है जो ऋण के लिए चांदी-सोना गिरवी रखता है, और वह घर है जिससे प्रधानमंत्री अब राष्ट्रीय हित में बेटी के गहने खरीदने को टाल देने के लिए कह रहे हैं।

उस नाते प्रधानमंत्री के 10 मई के भाषण ने आखिरकार यही उजागर किया। यह लीडरशिप का क्षण नहीं था, बल्कि अनायास आई पारदर्शिता से लोगों को संकट के लिए तैयार करने का क्षण था। क्योंकि जब कोई सरकार संकट में सबसे पहले नागरिकों के सोने की ओर देखती है, तब वह कॉरपोरेट से अपील नहीं कर रही होती। वह अपनी संयम और अपनी कटौती नहीं बता रही होती। वह लोगों को छुट्टी रद्द करने को कह रही होती है, लेकिन प्रधानमंत्री खुद तुरंत यूरोप की उड़ान भरते हैं। सो लब्बोलुआब क्या? भारत में त्याग के लिए भी एक वर्ग तय है—मध्यवर्ग, यानी आम जन।

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