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मोदी को पता भी कि लालकिले से क्या बोला?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ताजा जुमला इतिहास में उनकी याद का शायद एक और शब्द हो। 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति, भारतीय मानस की शब्दावली में एक विचित्र नया लेबल जोड़ा—दिमागी नक्सल।

मानती हूं, मेरे जैसे लोगों के लिए इस शब्द में एक खास तरह की गूंज है। भारत सके लोगों ने भी इसे पकड़ने में देर नहीं लगाई। चौबीस घंटों के भीतर ही सोशल मीडिया पर गर्व से खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहने वाले लोग आ गए, रेडिट पर इसके लिए अलग फ्लेयर की मांग होने लगी, दिमागी जनता पार्टी बनाने के मजाक चलने लगे, जबकि पी. चिदंबरम ने सीधे घोषणा कर दी कि उन्हें दिमागी नक्सल कहलाने पर गर्व है।

दरअसल राजनीतिक गालियों की एक दिलचस्प आदत होती है—वे अपने रचयिता के हाथ से तुंरत निकल जाती हैं। फिर दिमागी होना कोई सबसे बुरा आरोप भी नहीं है। आखिर सर्वप्रथम दिमाग तो है!

लेकिन मजाक को थोड़ी देर के लिए किनारे रखिए और पहले उस मंच को देखिए जहां से यह कहा गया।

स्वतंत्रता दिवस साल का वह एक दिन है जब प्रधानमंत्री केवल किसी पार्टी या सरकार के मुखिया की तरह नहीं, बल्कि गणराज्य की आवाज़ की तरह बोलता है। लाल किला वह जगह है जहां भारत खुद को देखता है—अपनी यात्रा, अपनी महत्वाकांक्षाओं, अपनी उम्मीदों को—और अपने लोगों से, और दुनिया से, यह कहता है कि वह अपने बारे में क्या मानता है।

यही वह मंच है जहां से प्रधानमंत्रियों ने ऐसे शब्द छोड़े हैं जो अपने भाषणों से बड़े हो गए। नेहरू ने एक युवा भारत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक राष्ट्र-निर्माण की भाषा दी। लाल बहादुर शास्त्री ने दिया—जय जवान, जय किसान—सैनिक और किसान, दोनों गणराज्य के केंद्र में। अटल बिहारी वाजपेयी ने उसमें जय विज्ञान जोड़ा—विज्ञान भी वहीं होना चाहिए। मनमोहन सिंह ने इसी प्राचीर से भारत के “ज्ञान अर्थव्यवस्था” में प्रवेश की बात की। कहा कि दुनिया में भारत की जगह “नए शोध और नई सोच” पर निर्भर करेगी।

इनमें कोई भी परिपूर्ण प्रधानमंत्री नहीं था, न उनके समय का भारत कोई परिपूर्ण भारत था। यह तर्क भी नहीं है। भारत ने हर रंग की सरकार में सेंसरशिप, असहिष्णुता और असहमति के दमन को देखा है। तर्क इससे कहीं संकरा और सटीक है—शब्दावली का। असल बात, उस खास मंच पर खड़े होकर कोई नेता राष्ट्रीय कल्पना में क्या रखता है? क्या बताता है?

जवान, किसान, विज्ञान, ज्ञान, नई सोच—इनमें से हर शब्द ने किसी न किसी तरह राष्ट्रीय कल्पना का दायरा बढ़ाया। किसी नई भूमिका को सम्मान दिया, किसी नई क्षमता को विकसित करने का आग्रह किया, भारत क्या बन सकता है इसका एक और रूप सामने रखा।

‘दिमागी नक्सल’ इसका उलटा करता है।

यह उस शब्दावली में कोई नया जोड़ नहीं है। यह उसमें से कुछ घटाता है।

लालकिले की इस परंपरा में पहली बार दिलचस्प पात्र वह भारतीय नहीं है जिसे बनने के लिए हमें कहा जा रहा है, बल्कि वह भारतीय है जिसे पहचानने के लिए कहा जा रहा है। कोई ऐसा नहीं जिसे राष्ट्रीय कल्पना के भीतर लाया जाए, बल्कि कोई ऐसा जिसे उससे अलग किया जाए। और यह भारत के उसी मंच से कहा गया है जिसका अर्थ कम-से-कम उस सुबह सबके लिए बोलना होता है।

दूसरा, इस वाक्यांश को किसी पक्षधर की तरह नहीं, एक देशभक्त की तरह देखिए, तो इसमें कुछ गहरे स्तर पर अदेशभक्तिपूर्ण लगेगा। मैं यह शब्द पूरी गंभीरता से इस्तेमाल कर रही हूं।

पिछले बारह वर्षों में “राष्ट्रविरोधी” जुमला भारतीय राजनीति के सबसे आसानी से इस्तेमाल किए जाने वाले आरोपों में रहा है। प्रदर्शनकारियों पर, छात्रों पर, पत्रकारों पर, शिक्षाविदों पर, कार्यकर्ताओं पर, राजनीतिक विरोधियों पर। लेकिन राष्ट्रीय भावना के अधिक खिलाफ और क्या हो सकता है कि स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधानमंत्री यह संकेत दे कि देश अपने सोचने वाले लोगों से ही सावधान रहे? भारत को इससे अधिक छोटा क्या कर सकता है कि भारतीय दिमाग—जिसे हम दुनिया के सामने अपनी ताकत के रूप में पेश करते हैं—उसे राजनीतिक संदेह की श्रेणी में बदल दिया जाए?

भारत एक ऐसा देश है जिसे आज भी ज्ञान-शक्ति के रूप में जाना और सम्मान दिया जाता है। सिलिकॉन वैली में भारतीय मूल के सीईओ हमें राष्ट्रीय उपलब्धि लगते हैं। कोई भारतीय वैज्ञानिक विदेश में सफलता हासिल करे तो हम गर्व करते हैं। कोई भारतीय गणितज्ञ सम्मानित हो, हमारे इंजीनियर दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों के लिए निर्माण करें—हमें गर्व होता है। हम शून्य और आर्यभट्ट को याद करते हैं, नालंदा और तक्षशिला को भी। हमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चाहिए, सेमीकंडक्टर फैक्ट्रियां चाहिए, रिसर्च यूनिवर्सिटियां, पेटेंट, नोबेल पुरस्कार, स्टार्टअप चाहिए।

खुद प्रधानमंत्री मोदी बार-बार भारत के युवाओं से कहते हैं—इनोवेट करो, डिसरप्ट करो, सपने देखो, बड़ा सोचो। और फिर आता है—दिमागी नक्सल।

विरोधाभास मज़ेदार होता, यदि वह इतना कुछ उजागर न करता। भारतीय दिमाग आविष्कार करे तो उसका उत्सव मनाइए। वही दिमाग सवाल पूछे तो बात जटिल हो जाती है।

इसीलिए मैं बार-बार नक्सल से ज्यादा दिमाग पर लौटती हूं।

राजनीतिक भाषा अंततः इतिहास का प्रमाण बन जाती है। वह आने वाली पीढ़ियों को केवल यह नहीं बताती कि किसी सरकार ने क्या किया, बल्कि यह भी कि उसने किस चीज़ की प्रशंसा की, उसने क्या कल्पना की और कई बार वह किससे डरती थी। और इसीलिए इस शब्द की परिभाषा का न होना महत्वपूर्ण है। आखिर दिमागी नक्सल है कौन? मोदी ने नहीं बताया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग नक्सली विचारधारा अपने दिमाग में रखते हैं, देश और युवाओं को गुमराह करने के मौके तलाशते हैं और उन्हें “पहचानकर अलग-थलग” किया जाना चाहिए। लेकिन यह श्रेणी शुरू कहां होती है और खत्म कहां, यह नहीं बताया गया। जब भाषा साधारण राजनीतिक गाली की नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की हो, तो यह कोई छोटा सवाल नहीं है। और यह अस्पष्टता संयोग भी नहीं है। यही इस शब्द की राजनीतिक उपयोगिता है। प्रधानमंत्री मोदी ने पहले भी ऐसे कई शब्द दिए हैं। लेकिन यहां फर्क है। अर्बन नक्सल में कम-से-कम भूगोल था। आंदोलनजीवी के लिए कम-से-कम कोई आंदोलन होना जरूरी था। टुकड़े-टुकड़े गैंग में, कल्पनाशील ढंग से ही सही, किसी गैंग के होने का संकेत था। दिमागी नक्सल में किसी सदस्यता कार्ड की जरूरत नहीं। यहां भूगोल दिमाग के भीतर है।

कुछ ही घंटों में दिख भी गया कि यह इलाका कितना फैल सकता है। एक छोर पर भाजपा के एक प्रवक्ता ने कहा कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने “दिमागी नक्सल इकोसिस्टम की मानसिकता” दिखाई है—सबूत यह कि वे समारोह में मौजूद नहीं थे। दूसरे छोर पर एक भाजपा मंत्री की कहीं अधिक गंभीर व्याख्या टिप्पणी में घूमती रही—दिमागी नक्सल यानी माओवादी समर्थक, संविधान को भीतर से कमजोर करने वाला, अलगाववादी, ऐसा व्यक्ति जो अनुच्छेद 370 की वापसी चाहता हो या यहां तक कि उत्तर-पूर्व को भारत से उसके संकरे ‘चिकन नेक’ गलियारे के रास्ते काट देना चाहता हो। दूसरे शब्दों में—देशद्रोह, मानसिकता के कपड़ों में। लेकिन दोनों अर्थ एक साथ सही नहीं हो सकते।

यदि किसी समारोह में अनुपस्थित रहना किसी व्यक्ति को उसी श्रेणी में डाल देता है जिसमें देश को दो हिस्सों में काटने की साजिश करने वाला व्यक्ति आता है, तो उस शब्द का अर्थ ही समाप्त हो जाता है। और जो सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीरता से लेने का दावा करती है, उसे इस शब्दावली को इतनी लापरवाही से खर्च करने वालों में सबसे आख़िर में होना चाहिए। यदि दूसरा, अधिक गंभीर अर्थ ही असली दिमागी नक्सल है, तो साफ कहिए। देश को बताइए—कौन माओवादी हिंसा का समर्थन कर रहा है? कौन संविधान को नकार रहा है? कौन उत्तर-पूर्व को अलग करना चाहता है? और प्रमाण दीजिए। यह भ्रम मोदी सरकार को उसके आलोचकों से अधिक परेशान करना चाहिए। क्योंकि आज जो लोग सबसे असुविधाजनक सवाल पूछ रहे हैं, वे दिमागी नक्सल की इन दोनों परिभाषाओं में सहजता से फिट नहीं बैठते। इस गर्मी में लीक हुए परीक्षा-पत्रों और अटकी भर्तियों को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों ने यही दिखाया।

यह समझने के लिए नरेंद्र मोदी और भारत के बौद्धिक प्रतिष्ठान के पुराने रिश्ते को याद करना उपयोगी है। 2014 में दिल्ली आए मोदी एक प्रतिष्ठान को चुनौती दे रहे थे। और उस चुनौती में दम था। भारत का पुराना बौद्धिक अभिजात वर्ग कई बार बेहद छोटा, बंद और खुद से असाधारण रूप से प्रसन्न रहने वाला था। दिल्ली के अपने ड्रॉइंग रूम थे, विश्वविद्यालय थे, सांस्कृतिक संस्थान थे, पत्रकार, नौकरशाह और गेटकीपर थे। अंग्रेज़ी की धार को बुद्धिमत्ता समझ लिया जाता था, सत्ता के निकट होने को भारत की समझ। प्रांतीय व्यक्ति को संरक्षण की निगाह से देखा जाता था। भारतीय भाषाओं में कही बात को ‘परिष्कृत’ माने जाने से पहले अक्सर अंग्रेज़ी अनुवाद की जरूरत पड़ती थी।

मोदी ने उस दुनिया के खिलाफ जमा नाराज़गी को बहुत अच्छी तरह समझा, भुनाया। उन्हें उस क्लब में बुलाया नहीं गया, तो उन्होंने अपना क्लब बना लिया। और फिर जीते। बार-बार जीते।

लेकिन सत्ता में बारह साल किसी बाहरी व्यक्ति के बने रहने के लिए लंबा समय होता है। नरेंद्र मोदी अब भारत के प्रतिष्ठान के दरवाजे पर खड़े होकर भीतर आने की मांग नहीं कर रहे हैं। अब वे स्वयं प्रतिष्ठान हैं। उनकी पार्टी ने देश की राजनीति को बदल दिया है। उनकी शब्दावली रोजमर्रा की भाषा में उतर चुकी है। उनकी योजनाओं ने करोड़ों बच्चों का बचपन आकार दिया है। और वे बच्चे अब बड़े हो गए हैं। यह वह पीढ़ी है जिसका लगभग पूरा बचपन मोदी के भारत में बीता है—मन की बात, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, आत्मनिर्भर भारत और अब विकसित भारत के बीच।

उसे आकांक्षा का वादा मिला था। मेरिट का। टेक्नोलॉजी से चलने वाले ऐसे भारत का जहां पुराने संपर्क और नेटवर्क कम मायने रखेंगे। अब वह इतनी बड़ी हो चुकी है कि उस वादे को परख सके। यही हाल के छात्र आंदोलनों को राजनीतिक रूप से दिलचस्प बनाता है। उन्होंने यह नहीं दिखाया कि युवा किसी व्यवस्थित तरीके से वामपंथ या कांग्रेस की तरफ जा रहे हैं। उन्होंने यह दिखाया कि युवा भारतीय मोदी के राष्ट्रवाद से सहमत हो सकते हैं, शायद उनकी प्रशंसा भी करते हों, लेकिन लीक होते प्रश्नपत्रों, अटकी भर्तियों और लगातार वादे बने हुए रोजगार से उनका धैर्य जवाब दे चुका है।

उनकी शिकायत उस राजनीतिक शब्दावली से कहीं कम क्रांतिकारी है जो उनके आसपास उछाली जा रही है। वे बस चाहते हैं कि शिक्षा व्यवस्था काम करे। मोदी पुराने प्रतिष्ठान से लड़ना जानते थे क्योंकि वे उसका नाम ले सकते थे। कांग्रेस, वामपंथ, लुटियंस दिल्ली, टुकड़े-टुकड़े गैंग, आंदोलनजीवी – हर एक के साथ कोई विचारधारा थी, कोई पता था, कोई परिचित चेहरा। जेन ज़ी को किसी लेबल से खारिज कर देना कहीं मुश्किल सवाल है। यह पीढ़ी इतनी बड़ी हो चुकी है कि वादे की तुलना अनुभव से कर सके। और उसका सवाल यह नहीं है कि मोदी का भारत का विचार सही है या गलत।

सवाल यह है कि मोदी सरकार ने काम कितना किया? और यह सवाल पाकिस्तान से नहीं आ रहा। न किसी जंगल के कैंप से निकला है। उत्तर-पूर्व के किसी अलगाववादी नक्शे से भी नहीं। यह उसी घर के भीतर से आ रहा है जिसे उन्होंने बनाया। यह बस स्वतंत्र है। और शायद उसका कोई तैयार नाम न मिल पाने पर सरकार ने अपने पास बचा सबसे पुराना और सबसे गंभीर नाम उठा लिया—देशद्रोह—और फिलहाल उसे एक खाली कुर्सी की तरफ इशारा कर दिया।

शायद इसी वजह से ‘दिमागी नक्सल’ मोदी के तीसरे कार्यकाल का इतना revealing वाक्यांश है। मोदी ने इसे भारत के लिए चेतावनी के रूप में इस्तेमाल किया। इतिहास शायद इसे दूसरी तरह याद करे। उस क्षण की तरह जब भारत के सबसे शक्तिशाली राजनेता ने हमें बता दिया कि किस तरह का भारतीय अब उसे असुविधाजनक लगने लगा है।

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