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रूस–यूक्रेन युद्ध 1,566 दिनों पार, दुनिया युद्ध खत्म कराना भूल गई!

यूक्रेन का युद्ध अब पहले महायु्द्ध से लंबा हो चुका है। यह तुलना केवल दिनों की संख्या के कारण चौंकाने वाली नहीं है। प्रथम विश्वयुद्ध 1,566 दिनों तक चला था और उसने बीसवीं सदी की दिशा बदली थी। साम्राज्य टूटे, सीमाएँ बदलीं और अंततः एक ऐसी शांति व्यवस्था बनी, जो चाहे जितनी त्रुटिपूर्ण रही हो, फिर भी वह एक स्पष्ट निष्कर्ष का बोध कराती थी। इस महीने रूस–यूक्रेन युद्ध ने भी वही अवधि पार कर ली।

लेकिन 1918 के विपरीत आज कोई निश्चितता से नहीं कह सकता कि विजय कैसी दिखेगी, शांति कैसी दिखेगी, या इस संघर्ष की अंतिम तस्वीर क्या होगी।आमतौर पर इस अनिश्चितता को युद्ध की परिस्थितियों से समझाया जाता है। रूस हार नहीं सकता। यूक्रेन आत्मसमर्पण नहीं कर सकता। यूरोप रूसी विजय स्वीकार नहीं कर सकता। अमेरिका कीव को पूरी तरह छोड़ नहीं सकता, लेकिन वह अनंतकाल तक चलने वाले युद्ध में भी स्वयं को झोंकना नहीं चाहता। चीन सतर्क निगाह से देख रहा है, क्योंकि किसी भी पक्ष की निर्णायक जीत उसके हित में नहीं है।

इन सभी तर्कों में सच्चाई का अंश है। लेकिन रूस–यूक्रेन युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि वह रूस या यूक्रेन के बारे में क्या बताता है। उसकी असली महत्ता इस बात में है कि वह हमारे समय के बारे में क्या उजागर करता है।

आधुनिक इतिहास के अधिकांश काल में युद्ध राजनीतिक परिणाम पैदा करने का क्रूर माध्यम हुआ करते थे। नेपोलियन युद्धों ने यूरोप की नई व्यवस्था गढ़ी। अमेरिकी गृहयुद्ध ने संघ को बचाए रखा। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्धों ने पूरी अंतरराष्ट्रीय संरचना बदल दी। यहाँ तक कि दशकों तक चला शीतयुद्ध भी एक पहचाने जा सकने वाले निष्कर्ष पर समाप्त हुआ। एक पक्ष ढह गया, दूसरा विजयी हुआ और दुनिया एक नए अध्याय में प्रवेश कर गई। लेकिन इक्कीसवीं सदी मानो इस क्षमता को खोती जा रही है।प्रथम विश्वयुद्ध इसलिए भी समाप्त हुआ था क्योंकि उसे लंबा खींचना राजनीतिक रूप से असहनीय हो गया था। युद्ध को 1914 के क्रिसमस तक समाप्त हो जाना था। जब ऐसा नहीं हुआ तो वही विफलता अपने आप में संकट बन गई। सरकारें गिरीं, सेनापति हटाए गए, समाज अनिश्चितकालीन क्षति के बोझ तले टूटने लगे। समय स्वयं एक सैन्य और राजनीतिक शक्ति था। युद्धविराम आया तो लोगों ने केवल राहत नहीं महसूस की, बल्कि उन्हें ऐसा लगा मानो समय अपनी सामान्य गति में लौट आया हो।

आज वह बेचैनी नहीं है। किसी ने यह वादा नहीं किया था कि यूक्रेन का युद्ध क्रिसमस तक समाप्त हो जाएगा। विजय न दिला पाने के कारण कोई सरकार नहीं गिरी। युद्ध धीरे-धीरे प्रशासनिक स्थायित्व का हिस्सा बन गया है। हर कुछ महीनों में सहायता पैकेज, हर साल नए वित्तीय वचन, मीडिया का आता-जाता ध्यान। आधुनिक भू-राजनीति की व्यवस्थाओं ने केवल इस युद्ध को जीवित नहीं रखा है; उन्होंने इसे जीवित रखना ही कुशल शासन का प्रमाण बना दिया है। युद्ध अब असफलता नहीं, प्रबंधन का विषय बन गया है।

दूसरे समकालीन संघर्षों को देखिए। गाज़ा युद्ध और युद्धविराम के बीच झूलता रहता है। ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच टकराव हमलों, प्रतिहमलों और कूटनीति के चक्र में घूमता रहता है, लेकिन स्थायी समाधान तक नहीं पहुँचता। आज का लगभग हर संघर्ष एक विचित्र मध्यावस्था में प्रवेश कर जाता है—न पूरी तरह समाप्त, न पूरी तरह सक्रिय। वह अंतरराष्ट्रीय राजनीति की पृष्ठभूमि में बना रहता है, तब भी जब जनता का ध्यान कहीं और चला जाता है।

यह केवल सैन्य घटना नहीं है। यह उस व्यापक परिवर्तन का प्रतिबिंब है जिसके तहत आधुनिक संस्थाएँ संकटों को देखने लगी हैं। बीसवीं सदी को विश्वास था कि समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। इक्कीसवीं सदी का विश्वास यह है कि समस्याओं को केवल प्रबंधित किया जा सकता है। समाधान की जगह प्रशासन ने ले ली है। युद्ध भी उसी रास्ते पर चल पड़े हैं।

आज यूक्रेन एक ऐसे संघर्ष जैसा दिखाई देता है जिसे समाप्त नहीं, बल्कि संभाला जा रहा है। लक्ष्य अब पारंपरिक अर्थों में विजय नहीं है। लक्ष्य है बदतर परिणामों को रोकना। रूस को निर्णायक जीत से रोकना। यूक्रेन को ढहने से रोकना। नाटो को सीधे युद्ध में उतरने से रोकना। यूरोप-व्यापी संघर्ष को रोकना। परमाणु टकराव को रोकना।

इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था विनाश रोकने में तो आश्चर्यजनक रूप से सक्षम दिखाई देती है। लेकिन समझौता पैदा करने में वह लगातार असहाय होती जा रही है।

यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अनेक महान विचारकों को उलझन में डाल देती। हांस मॉर्गेन्थाउ का मानना था कि राष्ट्र अपने हितों की सुरक्षा के लिए शक्ति का अनुसरण करते हैं। केनेथ वॉल्ट्ज अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को ऐसे ढाँचे के रूप में देखते थे जो संतुलन पैदा करती है। यहाँ तक कि फ्रांसिस फुकुयामा की चर्चित “इतिहास के अंत” की अवधारणा भी इस धारणा पर आधारित थी कि राजनीतिक व्यवस्थाएँ अंततः किसी निष्कर्ष की ओर बढ़ती हैं। इन विचारकों के बीच मतभेद थे, लेकिन एक साझा विश्वास भी था—इतिहास की कोई दिशा होती है। आज दिशा का विचार ही धुंधला पड़ता दिखाई देता है।

इसके स्थान पर हम शायद एक “रणनीतिक जड़ता के युग” में प्रवेश कर चुके हैं। हर बड़ी शक्ति के पास परिणामों को रोकने की क्षमता है, लेकिन उन्हें निर्णायक रूप से आकार देने की क्षमता नहीं। रूस युद्ध को लंबा खींच सकता है, लेकिन निर्णायक विजय हासिल नहीं कर सकता। यूक्रेन प्रतिरोध कर सकता है, लेकिन अपना समूचा भूभाग वापस नहीं ले सकता। यूरोप कीव को सहारा दे सकता है, लेकिन युद्ध समाप्त नहीं करा सकता। अमेरिका घटनाओं को प्रभावित कर सकता है, लेकिन वह निर्विवाद वैश्विक प्रभुत्व अब उसके पास नहीं है। शक्ति प्रचुर मात्रा में मौजूद है। समाधान नहीं।

परिणामस्वरूप हम ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ घटनाएँ चलती रहती हैं, लेकिन कहीं पहुँचती नहीं। सूचना के विस्फोट के इस युग में भी राजनीति अनेक लोगों को स्थिर और जड़ प्रतीत होती है। हर मिनट समाचार आता है। हर महीने शिखर सम्मेलन होते हैं। रोज़ बयान जारी होते हैं। फिर भी बहुत कम चीज़ें वास्तव में सुलझती हैं। इतिहास अब निष्कर्ष की ओर बढ़ते अध्यायों की श्रृंखला नहीं लगता। वह एक अंतहीन वर्तमान जैसा महसूस होता है।

इसलिए रूस–यूक्रेन युद्ध का प्रथम विश्वयुद्ध की अवधि पार कर जाना केवल एक सैन्य आँकड़ा नहीं है। यह एक सभ्यतागत संकेत है। महाशक्तियों के सीधे टकराव को रोकने के लिए जो संस्थाएँ बनाई गई थीं, वे अब भी इतनी मजबूत हैं कि पूर्ण विनाश रोक सकें। लेकिन वे राजनीतिक अंत रचने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं रह गई हैं। यही अंतर सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

दशकों तक युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की सफलता का पैमाना यह था कि वह महाविनाश टाल सके। उस कसौटी पर वह सफल रही है। तीसरा विश्वयुद्ध नहीं हुआ। परमाणु महाशक्तियाँ सीधे युद्ध में नहीं उतरीं। लेकिन विनाश टाल देना और विवाद समाप्त कर देना एक ही बात नहीं है। किसी समाज का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह आपदा रोक सकता है। यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या वह संघर्षों को समाप्त कर सकता है, विवादों का निपटारा कर सकता है और संकट से आगे बढ़ सकता है।

शायद यूक्रेन का सबसे गहरा सबक यही है। इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती युद्ध नहीं हो सकती। मनुष्य हमेशा लड़ने के कारण खोज लेता है। असली चुनौती शायद अंतों का लोप है। हमने ऐसी दुनिया बना ली है जो स्वयं को बनाए रखने, झटकों को झेलने और पतन को टालने में असाधारण रूप से दक्ष है। लेकिन लगता है कि हमने वह आत्मविश्वास, वह कल्पनाशक्ति और वह राजनीतिक क्षमता खो दी है जो संघर्षों को वास्तव में समाप्त कर सके।

रूस–यूक्रेन युद्ध अब प्रथम विश्वयुद्ध से लंबा चल चुका है। इससे भी अधिक बेचैन करने वाला प्रश्न यह है कि क्या दुनिया को अब भी याद है कि ऐसे युद्धों का अंत कैसे किया जाता है?

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