समाजवादी पार्टी ने राज्यसभा के चुनाव से पहले खूब जुबानी ताकत दिखाई लेकिन अंत में उसने तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारा। सोचें, सपा ने राज्यसभा चुनाव के लिए चार पर्चे खरीदे थे। उधर भाजपा ने भी नौ पर्चे खरीद लिए थे। अगर समाजवादी पार्टी तीसरा उम्मीदवार देती तो भाजपा भी नौवां उम्मीदवार उतारती और उसके बाद एक सीट के लिए घमासान चुनाव होता। सपा को दो सीट जीतने के बाद तीसरी सीट जीतने के लिए नौ अतिरिक्त वोट की जरुरत थी जबकि भाजपा को आठवीं सीट के लिए दो अतिरिक्त वोट की जरुरत थी। इस बात की बहुत चर्चा होती रही कि सपा की टिकट पर भाजपा के बाहुबली ब्रजभूषण शऱण सिंह चुनाव लड़ सकते हैं।
यह भी कहा जा रहा था कि अगर वे लड़ने उतरे तो वे अतिरिक्त वोट का जुगाड़ कर लेंगे। ध्यान रहे भाजपा के के सम के एक विधायक राकेश सचान सपा के संपर्क में दिख रहे थे और ओमप्रकाश राजभर के दो विधायक पाला बदल चुके हैं। ऐसे में सपा को छह और वोट जुगाड़ करना होता। लेकिन उसने तीसरी सीट पर दांव लगाने की बजाय दूसरी सीट सुरक्षित की। पहली सीट तो अखिलेश यादव के चाचा रामगोपाल यादव के लिए आरक्षित थी। लेकिन दूसरी सीट में भी पंगा न हो जाए इसलिए गुजरात के रहने वाले, रिलायंस समूह से जुड़े भाजपा समर्थित राज्यसभा सांसद परिमल नाथवानी के बेटे धनराज नाथवानी को अखिलेश ने टिकट दे दिया। उनको पता था कि भाजपा धनराज नाथवानी की सीट नहीं डिस्टर्ब करेगी। तब भी इस सीट को सुरक्षित करने के लिए उन्होंने तीसरा उम्मीदवार नहीं उतारा। अब सपा के इकोसिस्टम के लोग ब्रजभूषण शरण सिंह पर दोष डाल रहे हैं कि वे लड़े नहीं, जबकि हकीकत यह है कि सपा को तीसरी सीट पर लड़ना ही नहीं था।
