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बिहार में सत्ता परिवर्तन 10 अप्रैल तक

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी आखिरी राजनीतिक यात्रा पूरी कर ली है। राज्यसभा के लिए नामांकन करने के बाद वे समृद्धि यात्रा पर निकले थे। पिछले साल उन्होंने समृद्धि यात्रा शुरू की थी और उत्तर बिहार से लेकर मध्य और दक्षिण बिहार के राज्यों में वे गए थे। लेकिन पूर्वी इलाका छूट गया था। सीमांचल में उनकी यात्रा नहीं गई थी। इस बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्वांचल में तीन दिन कैम्प किया। इसके बाद ही नीतीश को राज्यसभा के लिए नामांकन करने पर मजबूर किया गया। नामांकन के बाद वे सीमांचल में समृद्धि यात्रा पर गए। वे पूर्णिया, किशनगंज आदि सभी इलाकों में गए और बेगूसराय ने यात्रा का समापन किया। हर जगह कहा गया कि वे कहीं नहीं जा रहे हैं। वे बिहार को देखते रहेंगे। परंतु सबको पता है कि यह उनकी आखिरी राजनीतिक यात्रा थी।

खुद नीतीश कुमार ने भी नामांकन के बाद ही संकेत दे दिया था कि वे जा रहे हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि अब सत्ता हस्तांतरण की तैयारी हो गई है। आठ से 12 अप्रैल के बीच बिहार में सत्ता बदल जाएगी। ध्यान रहे नौ अप्रैल को राज्यसभा के मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। करीब 21 साल के बाद पहली बार ऐसा होगा कि जनता दल यू के हाथ से मुख्यमंत्री का पद जाएगा। यह भी पहली बार होगा कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री का चुनाव नहीं करेंगे। हालांकि कहा जा रहा है कि भाजपा उनकी पसंद से ही मुख्यमंत्री का नाम तय कर रही है। तभी सम्राट चौधरी के नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है। माना जा रहा है कि वे ही मुख्यमंत्री बनेंगे। नीतीश कुमार उनको पसंद करते हैं। नीतीश ने उनको जनता से आशीर्वाद दिलाया है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने भी कई प्रयोग करने के बाद सम्राट चौधरी का ही कद बड़ा किया। उनको मुख्यमंत्री छोड़ कर सारे अहम पद मिल चुके हैं। वे प्रदेश अध्यक्ष रहे, विधान परिषद में पार्टी के नेता रहे, विधानसभा में पार्टी के नेता हैं और दो बार उप मुख्यमंत्री बने। अभी वे गृह मंत्रालय भी संभाल रहे हैं। वे राजद की यादव व मुस्लिम राजनीति के मुकाबले गौर यादव पिछड़ी जातियों की राजनीति में कोईरी, कुर्मी और धानुक के सामाजिक समीकरण का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।

बहरहाल, जानकार सूत्रों का कहना है कि सत्ता हस्तांतरण की शर्तों पर बात हो रही है। नीतीश कुमार चाहते हैं कि भाजपा का मुख्यमंत्री बन रहा है तो अभी के फॉर्मूले के हिसाब से ही उप मुख्यमंत्री जनता दल का हो और गृह मंत्रालय के साथ साथ स्पीकर का पद भी जदयू को मिले। लेकिन भाजपा इसके लिए तैयार नहीं है। भाजपा ये दोनों पद नहीं छोड़ेगी। भाजपा ने नीतीश को याद दिलाया है कि चार महीने पहले तक हमेशा गृह मंत्रालय मुख्यमंत्री के पास ही रहा। खुद नीतीश कुमार जब राजद के साथ गए थे तो तब पहली बार उन्होंने गृह मंत्रालय और स्पीकर का पद दोनों अपने पास रखा था। तभी भाजपा 2015 वाला फॉर्मूला लागू करना चाहती है। इस पर बात चल रही है। निशांत के लिए ऐसे मंत्रालय की तलाश हो रही है, जिससे तत्काल कामयाबी का मैसेज बने। दिल्ली में क्या होगा यह भी शर्तों में तय किया जा रहा है। ध्यान रहे जदयू के हरिवंश राज्यसभा के उपसभापति थे, जो अब रिटायर हो रहे हैं। उनकी जगह क्या जदयू को उप सभापति का पद मिलेगा? अगर मिलेगा तो संजय झा को वह पद देने की बात है, जबकि वे इसके लिए तैयार नहीं हैं। वे चाहते हैं कि जदयू उप सभापति का पद छोड़ दे और बदले में उसे एक कैबिनेट मंत्री का पद मिले। वे केंद्र में मंत्री बनना चाहते हैं।

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