पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के आंदोलन और छात्रों व युवाओं के आक्रोश की पहली परीक्षा बिहार की बांकीपुर सीट पर होनी है। वैसे तो मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव हुआ है लेकिन इन दोनों सीटों पर दूसरे मुद्दे थे और उम्मीदवार ऐसा नहीं था, जिससे आंदोलन को जोड़ा जा सके। दूसरी ओर बांकीपुर सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के इस्तीफे से खाली हुई है और इसलिए अहम है। दूसरी बात यह है कि चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर इस सीट से लड़े हैं, जो अतीत में बिहार के छात्रों को आंदोलन को सपोर्ट करते रहे हैं और एक बार गिरफ्तार भी हुए थे।
तभी ऐसा माना जा रहा है कि उनकी जीत हार से पता चलेगा कि चुनावी रूप से सीजेपी का आंदोलन कारगर है या नहीं? हालांकि बांकीपुर में सिर्फ 34 फीसदी वोटिंग हुई है और ‘जेन जी’ पहली परीक्षा में तो यही फेल हो गया। अगर उनमें उत्साह होता और कोई मैसेज देने की भावना होती तो वे बड़ी संख्या में बाहर निकलते और मतदान करते। लेकिन वे मतदान करने नहीं निकले। इसके बावजूद एक बड़ा समूह है, जो बदलाव की बात कर रहा था और कहा जा रहा है कि उसने जाति और धर्म से ऊपर उठ कर वोट किया है। इसकी परीक्षा चुनाव नतीजों में होगी। भाजपा ने भी ‘जेन जी’ की नाराजगी वाले मैसेज को फैलने से रोकने और अपना जातीय समीकरण टूटने की खबरों को गलत साबित करने के लिए बड़ा जोर लगाया है। तभी चुनाव में मुकाबला बहुत नजदीक का है। इससे बिहार की राजनीति बहुत बदलेगी और यह परीक्षा भी होगी कि छात्रों व युवाओं की नाराजगी का मुद्दा चुनावी लाभ दिलाने वाला होगा या नहीं।
