भारतीय जनता पार्टी ऐसा लग रहा है कि किसी काम की जल्दबाजी में नहीं है। जेपी नड्डा के मामले में देखने को मिला कि उनका तीन साल का कार्यकाल छह साल तक चला। बाद के तीन साल तो वे वैसे ही सेवा विस्तार पर चले, जैसे सीबीआई और ईडी के निदेशक और अन्य अधिकारी चलते हैं। छह साल बाद जैसे तैसे नड्डा की जगह नितिन नबीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो अभी तक उनकी टीम का गठन नहीं हुआ है। सोचें, 20 जनवरी को नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था। उसके एक महीने पहले वे कार्यकारी अध्यक्ष बने थे। लेकिन करीब साढ़े चार महीने के बाद भी नितिन नबीन अपनी टीम नहीं बना पाए हैं। अध्यक्ष बदलने के बाद भी पिछली टीम सेवा विस्तार पर चल रही है। यही हाल दो राज्यों में बनी नई सरकार का है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में बड़ी जीत हासिल की और सरकार बनाई लेकिन अब एक महीना होने जा रहा है और अभी तक मुख्यमंत्री सिर्फ पांच लोगों के साथ सरकार चला रहे हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी अकेले 42 विभाग संभाल रहे हैं। ऐसे ही असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा चार लोगों के साथ सरकार चला रहे हैं।
भाजपा को कतई इस बात की चिंता नहीं है कि उसे पश्चिम बंगाल में करीब 40 और मंत्री नियुक्ति करने हैं या असम में 16 मंत्री और बनाने हैं। उसे इस बात की भी परवाह नहीं है कि इतने कम मंत्रियों के साथ काम करने से काम की गुणवत्ता पर असर होता है। सोचें, अगर ऐसा किसी कांग्रेस शासित राज्य में हो जाता तो भाजपा कितना बड़ा मुद्दा बनाती और मीडिया किस तरह से कांग्रेस पर हमले करता। केरल में कांग्रेस को नेता चुनने में भाजपा के मुकाबले दो दिन का अधिक समय लगा था। लेकिन केरल में कांग्रेस नेता नहीं चुन पा रही है इस नैरेटिव पर डेढ़ सौ से ज्यादा डिबेट चैनलों में हुई थी। बहरहाल, इस लिहाज से देखें तो केंद्रीय मंत्रिमंडल में तो फेरबदल की कोई संवैधानिक जरुरत नहीं है। वह तो राजनीतिक जरुरत के लिहाज से किया जाना है। इसलिए वहां समय लग रहा है तो कोई क्या कर सकता है!
