शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इन दिनों लगातार गलत खबरों के कारण चर्चा में रहते हैं। वे पिछले कई महीने से यूजीसी की नियमावली को लेकर विवादों में घिरे हैं। भाजपा का सबसे हार्डकोर समर्थक वर्ग यानी अगड़ी जातियों के लोग उनसे खासे नाराज हैं। यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के लिए एक ऐसी नियमावली पेश की, जिसमें अगड़ी जातियों के किशोरों और युवाओं को बिना अपराध के ही दोषी मान लिया गया। पिछड़े, दलितों और आदिवासी छात्रों को यह अधिकार दिया गया कि वे अगड़ी जाति के छात्रों के खिलाफ झूठी शिकायत करके भी उन्हें उत्पीड़न कानून में फंसा सकते हैं। इस नियमावली का चौतरफा विरोध हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे भेदभाव वाला बताते हुए रोक लगा दी। वह विवाद चल ही रहा था कि धर्मेंद्र प्रधान ने त्रिभाषा फॉर्मूला का विवाद शुरू कर दिया है।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा फॉर्मूले की बात कही है। अभी तमिलनाडु सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के चुनाव चल रहे हैं और पांचों राज्य भाषायी अस्मिता वाले राज्य हैं। उससे पहले धर्मेंद्र प्रधान के मंत्रालय ने इस शैक्षणिक सत्र से इसे लागू करने का ऐलान किया है। इसके बाद इस पर विवाद शुरू हो गया। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार हिंदी अनिवार्य करने के लिए यह नीति ला रही है। उन्होंने सोशल मीडिया में इसे लेकर एक लंबी पोस्ट लिखी। इसका जवाब धर्मेंद्र प्रधान ने दिया और कहा कि सरकार हिंदी नहीं थोप रही है। इसमें भाषा का चुनाव वैकल्पिक रखा गया है। लेकिन इस सफाई से विवाद थम नहीं रहा है। चुनाव के बीच में इस विवाद से स्टालिन को अपना हिंदी विरोध दिखाने का मौका मिल गया है। ऐसा नहीं है कि तमिलनाडु में विरोध हो रहा है तो बाकी चुनावी राज्यों में इसको समर्थन मिल रही है। अभी किसी भी राज्य में भाजपा को इससे फायदा नहीं होने वाला है।
