धर्मेंद्र प्रधान भाजपा सरकार के उन शिक्षा मंत्रियों की तरह नहीं हैं, जिनका अचानक राजनीतिक बियाबान में भेज दिए गए। स्मृति ईरानी, प्रकाश जावडेकर और रमेश पोखरियाल निशंक की तरह धर्मेंद्र प्रधान की स्थिति नहीं होने वाली है। यह उनके इस्तीफे में हुई देरी और इस्तीफे का फैसला करने में हुई मशक्कत की खबरों से पता चल रहा है। इस्तीफे के बाद जिस तरह से भाजपा के शीर्ष नेताओं ने उनके योगदान को याद किया या उनकी तारीफ की उससे भी इसका संकेत मिलता है कि वे बाकियों से अलग हैं। इस्तीफे के बाद मंगलवार को जब वे पहली बार संसद पहुंचे तो जिस तरह से भाजपा के सांसदों ने उनका स्वागत किया वह भी इस बात का संकेत था कि धर्मेंद्र प्रधान का पुनर्वास होगा। यह संभवत पहली बार था, जब भाजपा सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा किसी और के नाम के नारे लगाए। संसद परिसर में ‘धर्मेंद्र प्रधान जिंदाबाद’ के नारे लगे। भाजपा सांसदों ने उनको बिहार के मिथिला पाग पहना कर उनका स्वागत किया। यह एक दुर्लभ दृश्य था और भाजपा के दूसरे बड़े नेताओं को भी निश्चित रूप से ईर्ष्या हुई होगी।
धर्मेंद्र प्रधान ने खुद भी कहा कि वे स्ट्रीट फाइटर हैं। इसके बाद सोशल मीडिया में भाजपा इकोसिस्टम ने उनके स्ट्रीट फाइटर होने की कहानी शेयर करनी शुरू की। बताया गया कि वे हवा में बने नेता नहीं हैं। जाहिर है यह सब अभियान उनको फिर से स्थापित करने या राजनीतिक चर्चा में बनाए रखने के लिए है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने उनका इस्तीफा तो करा लिया लेकिन साथ ही यह भी मैसेज दिया कि वह उनके कामकाज से नाराज नहीं है। खबर है कि आखिरी दिन तक भाजपा के वार्ताकारों ने उनका इस्तीफा टालने की कोशिश की थी। प्रधान ने जिस दिन इस्तीफा दिया और कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन समाप्त हुआ उससे एक दिन पहले भाजपा के वार्ताकारों की ओर से कहा गया था कि सरकार उनका मंत्रालय बदल देगी। लेकिन वार्ता करने गए आशुतोष रांका और सौरव दास इसके लिए तैयार नहीं हुए।
इसकी भनक राहुल गांधी को भी लग गई थी कि सरकार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कराने की बजाय उनका विभाग बदल कर मामला सुलझाने की कोशिश कर रही है। तभी शनिवार, 25 जुलाई को राहुल गांधी ने दिन में प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कराना होगा, विभाग बदलने से काम नहीं चलेगा। उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस के तीन घंटे के अंदर इस्तीफा हो गया था। इससे जाहिर है कि आखिरी तक सरकार ने उनको बचाने की कोशिश की। इसलिए भी माना जा रहा है कि उनका पुनर्वास होगा। लेकिन यह संभव नहीं है कि अगले महीने मंत्रिपरिषद में फेरबदल हो तो उनको फिर से सरकार में शामिल कर लिया जाए। इस बात की भी संभावना कम है कि नितिन नबीन की टीम में उनको महामंत्री आदि बनाया जाए। तभी तत्काल सबकी नजर ओडिशा की ओर मुड़ी है। कहा जा रहा है कि धर्मेंद्र प्रधान भी मंत्री पद से विदा होने के बाद ओडिशा में ज्यादा समय देंगे। हो सकता है कि आने वाले दिनों में उनको ओडिशा का मुख्यमंत्री बनाया जाए। अभी तुरंत नहीं तो उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद ऐसा हो सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि उनको उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी दी जा सकती है। अगस्त में मंत्रिमंडल में फेरबदल के बाद इस बारे में फैसला हो सकता है।
