महाभारत का एक प्रसंग है कि भगवान श्रीकृष्ण ने भीम के बेटे घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक का सिर काट कर एक स्थान पर रख दिया था और 18 दिन के युद्ध के बाद पूछा कि तुमने क्या देखा, बर्बरीक का जवाब था कि दोनों तरफ से आप ही लड़ रहे थे। जीत भी आपकी है और हार भी आपकी। जीवन भी आपका है और मृत्यु भी आपकी। इसी कहानी के संदर्भ से झारखंड की दो राज्यसभा सीटों को समझा जा सकता है। वास्तविकता यह है कि दोनों तरफ से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ही लड़ रहे थे। परिमल नाथवानी भले भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार थे लेकिन उनकी जीत भी हेमंत सोरेन की ही है क्योंकि उनकी लड़ाई भी वे ही लड़ रहे थे। कांग्रेस के नेता खुल कर नहीं बोल रहे हैं लेकिन अनौपचारिक बातचीत में दावा कर रहे हैं कि हेमंत नहीं चाहते थे कि कांग्रेस का उम्मीदवार जीते। ध्यान रहे उनके लिए प्रणब झा या कोई और उम्मीदवार मायने नहीं रखता था। इसका कारण यह है कि प्रणब झा के नाम की घोषणा से पहले ही उन्होंने परिमल नाथवानी के नाम पर हामी भर दी थी।
हेमंत सोरेन ने कैसे कांग्रेस के साथ दिखते हुए नाथवानी की जीत सुनिश्चित की इसके तीन प्रमाण हैं। पहला प्रमाण तो यह है कि उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार नाथवानी का पर्चा नहीं रद्द होने दिया। असल में नाथवानी का पर्चा भाजपा के एक नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद के वकील बेटे ने भरा था। इस पर्चे में कांग्रेस ने कम से कम तीन गलतियां पकड़ी। सोचें, मध्य प्रदेश में कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन के पर्चे में एक ऐसी गलती थी, जो असल में नहीं थी, फिर भी उनको बुला कर हाथ के हाथ पर्चा खारिज कर दिया गया। नाथवानी के पर्चे में तीन गलतियां थीं, जिनके लिए उनको नोटिस दिया गया और 24 घंटे का समय भी दिया गया। ध्यान रहे विधानसभा का सचिव राज्यसभा चुनाव में चुनाव अधिकारी होता है। खबर है कि हेमंत सोरेन की ओर से कई बार फोन करके सुनिश्चित किया गया कि पर्चा रद्द नहीं होना चाहिए। अगर पर्चा रद्द हो जाता तो उसी दिन जेएमएम और कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव जीत जाते। लेकिन राज्य सरकार ने सुनिश्चित किया कि नाथवानी का पर्चा रद्द न हो। जानकार सूत्र तो यहां तक दावा करते हैं कि पर्चे में इतनी गड़बड़ी थी कि चुपचाप दोबारा भरवा कर उसे जमा कराया गया।
बहरहाल, दूसरा प्रमाण यह है कि हेमंत सोरेन की पार्टी के उम्मीदवार बैद्यनाथ राम को 31 वोट मिले। इसकी कोई जरुरत नहीं थी। उनका उम्मीदवार 28 वोट पर चुनाव जीत जाता। लेकिन हेमंत ने 31 वोट उनके लिए आवंटित किए, जो उनको पड़े। कहने को कहा जा सकता है कि इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अगर कांग्रेस उम्मीदवार दूसरे स्थान पर आते तो ऑटोमेटिकली 28 से ऊपर वाले वोट उनके खाते में चले जाते। अगर ऐसा है तो फिर हेमंत ने अपने सभी 34 वोट क्यों नहीं बैद्यानाथ राम को आवंटित किए? असल में हेमंत सोरेन को पता था कि परिमल नाथवानी को 30 वोट आ रहे हैं। इसलिए उन्होंने अपने उम्मीदवार को उनसे एक वोट ज्यादा आवंटित किए। कहा जा रहा है कि उन्होंने सुनिश्चित किया कि महागठबंधन का कौन कौन विधायक नाथवानी को वोट करेगा। तीसरे को प्रमाण कम और संकेत ज्यादा कह सकते हैं। जिस दिन से परिमल नाथवानी को उम्मीदवार बनाया गया था उस दिन से जेएमएम के सोशल मीडिया हैंडल से जैसे भाजपा और केंद्र सरकार पर हमले बढ़े थे उससे लगने लगा था कि जेएमएम को जो करना है उसे छिपाने के लिए पोजिशनिंग की जा रही है। झारखंड में कहा तो यहां तक जा रहा है कि हेमंत ने पहले परिमल नाथवानी को अपनी पार्टी से लड़ने का प्रस्ताव दिया था और जब वे निर्दलीय लड़े तो हेमंत, उनकी पत्नी कल्पना सोरेन और हेमंत के भाई बसंत सोरेन ने नाथवानी के पक्ष में वोट किया।
