यह कमाल की बात है कि शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफे और जंतर मंतर पर 36 दिन से चल रहे धरने के खत्म होने से पहले राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की तो उसमें सीपीआई माले के छात्र संगठन आइसा के तीन सदस्य मंच पर मौजूद थे। सवाल है कि कांग्रेस का अपना भी तो छात्र संगठन है, जिसका इतना बड़ा कार्यालय रायसीना रोड पर है तो उसके सदस्य राहुल के साथ क्यों नहीं थे? राहुल के साथ होने का यह अर्थ नहीं है कि उस समय वहां क्यों नहीं थे, वहां तो थे लेकिन जिस वजह से आइसा की तीन सदस्यों को मंच पर बैठाया गया था वैसी वजह एनएसयूआई ने नहीं दी थी। आइसा की तीन छात्र नेताओं ने जंतर मंतर पर सोनम वांगचुक के साथ भूख हड़ताल की थी। करीब 21 दिन तक उन्होंने अनशन किया था।
इसमें दो बातें दिलचस्प हैं। पहली तो यह कि कांग्रेस का छात्र संगठन छात्रों और युवाओं के इस आंदोलन से पूरी तरह नदारद रहा। कहीं भी उन्होंने प्रोटेस्ट नहीं किया, न अनशन किया और न किसी ने भूख हड़ताल की। दूसरी दिलचस्प बात यह है कि जंतर मंतर पर तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई माले के छात्र संगठन क्रमशः एआईएसएफ, एसएफ्रआई और आइसा के छात्रों ने हिस्सा लिया। लेकिन राहुल के मंच पर आइसा की ओर से भूख हड़ताल करने वाली छात्रों को जगह मिली। क्या इसका कुछ संबंध सीपीआई माले के नेता दीपांकर भट्टाचार्य के साथ राहुल की केमिस्ट्री से भी है? गौरतलब है कि सीताराम येचुरी के निधन के बाद जो कम्युनिस्ट नेता राहुल के सबसे करीब हैं वो दीपांकर भट्टाचार्य हैं। बहरहाल, राहुल गांधी ने गुरुवार को भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, जिसमें उन्होंने कथित पैलेट गन के छर्रे से घायल हुए छात्र साहिल को मीडिया के सामने पेश किया था। साहिल 20 जुलाई को प्रदर्शन में घायल हुआ था। सोचें, उस दिन भी कोई एनएसयूआई के छात्र नेता घायल नहीं हुआ, जिसे राहुल मंच से पेश कर सकें! फिर भी आंदोलन का क्रेडिट पूरा चाहिए राहुल गांधी को!
