धर्मेंद्र प्रधान नरेंद्र मोदी सरकार के चौथे शिक्षा मंत्री हैं, जो बड़े बेआबरू होकर कूचे से निकले हैं। इससे पहले के तीन मंत्रियों की विदाई सम्मानजनक नहीं थी और न विदा होने के बाद किसी का पुनर्वास हुआ। 2014 में सरकार बनने के बाद स्मृति ईरानी पहली शिक्षा मंत्री बनी थीं। सोचें, जिनकी अपनी शिक्षा का कोई खास रिकॉर्ड नहीं था उनको शिक्षा मंत्री बनाया गया। ध्यान रहे अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी भाजपा की सरकारों में डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी शिक्षा मंत्री होते थे। तब मंत्रालय का नाम मानव संसाधन विकास मंत्रालय होता था। डॉक्टर जोशी के कामकाज को लेकर हमेशा एक ही आरोप लगे कि भारत में शिक्षा का भगवाकरण हो रहा है। वाजपेयी के शिक्षा मंत्री डॉक्टर जोशी के जवाब में मोदी की शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी थीं।
लेकिन शिक्षा से विदा हुईं तो थोड़े समय कपड़ा मंत्रालय में रहीं और फिर 2024 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद राजनीतिक बियाबान में भटक रही हैं। कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में उनका पुनर्वास हो सकता है। जब वे शिक्षा मंत्रालय से हटीं तो उनकी जगह प्रकाश जावडेकर को शिक्षा मंत्री बनाया गया। वे करीब तीन साल तक शिक्षा मंत्री रहे। मई 2019 में शिक्षा मंत्री से हटने के बाद करीब दो साल सूचना व प्रसारण मंत्री रहे। लेकिन 2021 के बाद वे राजनीतिक परिदृश्य से गायब हो गए। 2024 में राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हुआ तो उसके बाद वापसी नहीं हुई। उनके बाद रमेश पोखरियाल निशंक को शिक्षा मंत्री बनाया गया। वे शिक्षा मंत्रालय से हटे तो सरकार से ही विदा हो गए और पिछले चुनाव में तो उनको लोकसभा टिकट नहीं मिली।
निशंक के बाद धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री बने। उनके शिक्षा मंत्री रहते शिक्षा के क्षेत्र में जितने सुधार हुए उससे ज्यादा विवाद हुए। अब वे भी विदा हो गए हैं। वे ओडिशा से लोकसभा का चुनाव जीते हुए हैं। इसलिए 2029 तक सांसद हैं ही। इस बीच देखना होगा कि नई दिल्ली या ओडिशा में उनका पुनर्वास होता है या नहीं। तभी नए शिक्षा मंत्री को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। शिक्षा मंत्रियों के ऐसे हस्र को देखते हुए कौन मंत्री बनना चाहेगा।
