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राज्यपालों की नियुक्ति में क्यों देरी हो रही है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा अपने को मजबूत और शीघ्रता से निर्णय करने वाले नेता के तौर पर पेश करते हैं। लेकिन कुछ मामले ऐसे हैं, जिनमें सरकार को फैसाल करने में बहुत ज्यादा समय लगता है। सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति और राज्यपाल व उप राज्यपालों की नियुक्ति भी ऐसा ही मामला है। सरकार फैसला ही नहीं कर पाती है। तभी ज्यादातर महत्वपूर्ण पदों पर बरसों से एक ही अधिकारी बैठे हैं। उनको लगातार सेवा विस्तार मिल रहा है। इसी तरह राजभवनों में भी कई जगह पद खाली हैं लेकिन नियुक्ति नहीं की जा रही है। अनेक राजभवन तो बरसों से खाली हैं और किसी पड़ोसी राज्य के या दूरदराज के राज्य के राज्यपाल को प्रभार दिया गया है।

मिसाल के तौर पर पुड्डुचेरी के उप राज्यपाल का पद है। वह पद तीन साल से ज्यादा समय खाली है। किरण बेदी के इस्तीफा देने के बाद किसी को पुड्डुचेरी का उप राज्यपाल नहीं बनाया गया। तेलंगाना की राज्यपाल तमिलिसाई सौंदर्यराजन को वहां का प्रभार दे दिया गया। कुछ महीने पहले तमिलनाडु से चुनाव लड़ने के लिए सौंदर्यराजन ने इस्तीफा दे दिया तो तेलंगाना और पुड्डुचेरी दोनों के पद खाली हो गए। अब सुदूर झारखंड के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन तेलंगाना और पुड्डुचेरी का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं। इसी तरह दादर नागर हवेली और लक्षद्वीप दोनों केंद्र शासित प्रदेश का प्रभारी प्रफुल्ल खोड़ा पटेल संभाल रहे हैं। चंडीगढ़ में एक एक प्रशासक होता है, लेकिन सरकार ने पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित को ही वहां का भी प्रभार दे रखा है। अंडमान निकोबार में देवेंद्र कुमार जोशी करीब सात साल से पद संभाले हुए हैं। आनंदी बेन पटेल भी पिछले करीब सात साल से राज्यपाल हैं। मध्य प्रदेश के बाद अब वे उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं। कई पद इस साल खाली होने वाले हैं। गुजरात में आचार्य देवब्रत को 22 जुलाई को पांच साल पूरे होने जा रहे हैं। इस साल सितंबर में केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के पांच साल पूरे होंगे। सितंबर में ही कलराज मिश्र राजस्थान के राज्यपाल के तौर पर पांच साल पूरे करेंगे।

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