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भाजपा में नए प्रादेशिक क्षत्रप बन रहे हैं

Assam, March 19 (ANI): A BJP supporter, painted in party's flag format, waves BJP's flag as party candidate Himanta Biswa Sarma files his nomination papers ahead of Assam assembly elections, in Guwahati on Friday. (ANI Photo)

अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की भाजपा में कई प्रादेशिक क्षत्रप थे। ये क्षत्रप अपने केंद्रीय नेतृत्व का सम्मान तो करते थे लेकिन उनके भरोसे राजनीति नहीं करते थे। अपने प्रदेश की राजनीति में उनका अपना असर होता था। कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा उस जमाने के एकमात्र क्षत्रप हैं, जिन्होंने अभी तक अपनी ताकत बचा कर रखी है। कम से कम इस समय तक भाजपा का सर्वशक्तिशाली केंद्रीय नेतृत्व येदियुरप्पा को माइनस करके कर्नाटक की राजनीति नहीं कर पा रहा है। उनके अलावा बाकी क्षत्रपों का राजनीतिक असर समाप्त हो चुका है। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह, राजस्थान में वसुंधरा राजे, हिमाचल प्रदेश में प्रेम कुमार धूमल आदि अब अपने प्रदेश की राजनीति में चीजें निर्धारित नहीं करते हैं। वाजपेयी और आडवाणी के जमाने के बड़े क्षत्रपों में से एक नरेंद्र मोदी 12 साल पहले देश के प्रधानमंत्री बन गए। उसके बाद से प्रादेशिक क्षत्रपों की ताकत धीरे धीरे समाप्त हो गई।

लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि भाजपा के नए क्षत्रप उभर रहे हैं। पिछले 12 साल की राजनीति में जिन नेताओं को प्रदेश में महत्व मिला उनमें से कई नेता धीरे धीरे मजबूत हुए हैं औऱ प्रदेश की राजनीति में अपनी पकड़ बनाई है। ऐसे नेताओं के अलावा क्षत्रपों की एक नई पीढ़ी भी तैयार हो रही है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा में पिछले 12 साल में जो प्रादेशिक क्षत्रप मजबूत हुए उनमें पहला नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का है। उनके अलावा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस हैं, जिन्होंने प्रदेश की राजनीति में अपना वर्चस्व स्थापित किया है। ऐसे ही असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भले कांग्रेस से आए हैं लेकिन भाजपा में और असम की राजनीति में उन्होंने अपने को मजबूती से स्थापित किया है। इन तीन के अलावा भी अब कई नए क्षत्रप उभर रहे हैं, जिनकी राजनीति पर आगे नजर रखने की जरुरत है। ये सब नए मुख्यमंत्री हैं, जो प्रदेश में अपने हिसाब से फैसले कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का नाम इसमें सबसे चौंकाने वाला है। जानकार सूत्रों का कहना है कि मोहन यादव पिछले ढाई साल में इतने मजबूत हुए हैं कि प्रदेश के तमाम बड़े नेता चिंता में हैं। वैसे उनको मुख्यमंत्री बनाते समय ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने प्रदेश के बड़े नेताओं नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद सिंह पटेल आदि को किनारे कर दिया था। उमा भारती पहले से किनारे हैं और अब कहा जा रहा है कि मोहन यादव ने पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की टिकट कटवाई है। जानकार सूत्रों का कहना है कि उन्होंने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से कहा था कि उनके हिसाब से टिकट दी जाए तो वे पिछली बार हारी दतिया सीट जीत कर देंगे। अगर मोहन यादव उपचुनाव में आशुतोष तिवारी को चुनाव जीता देते हैं तो उनका कद और बढ़ेगा। साथ ही जमीन से जुड़े विवाद भी हाशिए में जाएंगे। ऐसे ही बिहार में सम्राट चौधरी के सामने प्रदेश के किसी नेता की चुनौती नहीं है। अगर वे बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर को अपने उम्मीदवार नीरज सिन्हा से हरवा देते हैं तो उनका भी कद बहुत बढ़ेगा। पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री बनते ही भाजपा को लोकसभा के 20 और राज्यसभा के तीन सांसद दिए हैं। तृणमूल कांग्रेस के विधायक दल और संसदीय दल के टूटने का श्रेय उनको जाता है। सो, अब योगी, फड़नवीस और हिमंता के साथ साथ सम्राट चौधरी, शुभेंदु अधिकारी, पुष्कर सिंह धामी और मोहन यादव भी प्रादेशिक क्षत्रप के तौर पर उभर रहे हैं। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व यानी मोदी और शाह ने चूंकि इनको चुना है इसलिए उनका पूरा समर्थन इन नेताओं को मिल रहा है।

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