लोकसभा, सभी विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने के लिए संविधान में संशोधन हो रहा है। सरकार ने 129वें संशोधन का बिल पेश किया है। इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति के सामने भेजा गया है, जिसकी अध्यक्षता भाजपा के सांसद पीपी चौधरी कर रहे हैं। शुरुआती प्रतिक्रिया में सभी विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध किया। भाजपा विरोधी लगभग सभी पार्टियों ने इसे संविधान विरूद्ध औऱ लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ बताया। अब ऐसा लग रहा है कि संविधान की कसौटी पर इस बिल को मान्यता मिल जाएगी। इसका कारण यह है कि सुप्रीम कोर्ट के चार पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने इस कसौटी पर बिल को सही बताया है। चारों ने संसदीय समिति के सामने कहा है कि बिल असंवैधानिक नहीं है यानी संविधान सम्मत है। एक बार यह बात स्थापित हो जाती है तो बाकी चीजों की सरकार को ज्यादा परवाह नहीं है।
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के चार पूर्व मुख्य न्यायाधीश संसदीय समिति के सामने पेश हुए। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस रंजन गोगोई। इनमें से जस्टिस रंजन गोगोई को केंद्र सरकार ने रिटायर होने के बाद राज्यसभा में मनोनीत किया। लेकिन बाकी तीनों चीफ जस्टिस किसी सरकारी पद पर नहीं गए। तभी उनकी राय को अहम माना जा रहा है। रिटायर चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने संसदीय समिति के सामने कहा कि यह विधेयक संविधान की कसौटी पर खरा उतरता है और संविधान के बुनियादी ढांचे यानी बेसिक स्ट्रक्चर के सिद्धांत के भी अनुरूप है। बाकी तीनों पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने भी कहा कि पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने का विचार बुनियादी ढांचे के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करता है। ऐसा लग रहा है कि संयुक्त संसदीय समिति ने एक रणनीति के तहत चार पूर्व मुख्य न्यायाधीशों को उनकी राय जानने के लिए आमंत्रित किया और चारों ने एक लाइन पर बिल की संवैधानिकता का समर्थन कर दिया। जाहिर है इसके बाद इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती देने में विपक्षी पार्टियों को मुश्किल आएगी। साथ ही कानून बनने के बाद इसे अगर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाती है तो वहां भी चार पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की राय आड़े आएगी।
चारों पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने इसकी संवैधानिक वैधता पर मुहर लगा दी है। लोकतंत्र के लिए यह अच्छा है या बुरा, इस पर न तो उनकी राय मांगी गई और न उन्होंने राय दी। वैसे भी यह राजनीतिक सवाल है, जिस पर आम जनता को फैसला देना है। हालांकि चारों पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने इसके एक प्रावधान पर सवाल उठाया है। चारों ने धारा 82 ए (5) के तहत चुनाव आयोग को दी जा रही शक्तियों पर सवाल उठाया है। इसमें यह प्रावधान किया गया है कि अगर चुनाव आयोग कहे कि किसी राज्य में चुनाव कराने के लिए स्थितियां अनुकूल नहीं हैं तो वहां चुनाव नहीं होगा। इस पर पूर्व चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने यह सुझाव भी दिया कि यह फैसला सिर्फ चुनाव आयोग पर नहीं छोड़ना चाहिए। इसमें केंद्र सरकार और संसद की भी भूमिका होनी चाहिए। इसके अलावा चारों पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने विधेयक में कुछ अस्पष्टता की शिकायत की है और कुछ सुझाव दिए हैं। लेकिन यह तय है कि उन्होंने सरकार की मुश्किलें काफी हद तक आसान कर दी हैं।
