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उच्च शिक्षा में नियमों में बदलाव का विरोध

अगर यह सवाल पूछा जाए कि केंद्र सरकार किस क्षेत्र में सबसे ज्यादा प्रयोग कर रही है या यह सवाल कि देश में सबसे ज्यादा किस क्षेत्र में प्रयोग हो रहा है तो उसका जवाब होगा, शिक्षा के क्षेत्र में। भारत में किसी भी क्षेत्र में प्रयोग नहीं होता है। स्पेस से लेकर मेडिसिन तक प्रयोग से भारत के लोग दूरी रखते हैं। सरकारें भी प्रयोग को प्रोत्साहित नहीं करती हैं। लेकिन भाजपा की केंद्र सरकार ने शिक्षा को प्रयोगशाला बना दिया है। हर तरह की पढ़ाई, किताबों, पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्चा से लेकर पढ़ाई के तरीके, संस्थान और परीक्षा के तरीके तक में प्रयोग किए जा रहे हैं। प्रतियोगिता परीक्षाओं में किस तरह के प्रयोग हुए हैं और उनका क्या असर हुआ है यह पूरे देश ने देखा है।

अब सरकार उच्च शिक्षा में प्रयोग के तहत विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल पास कराने की तैय़ारी में है। इस बिल पर संसद की संयुक्त समिति विचार कर रही है। भाजपा की सांसद डी पुरंदेश्वरी समिति की अध्यक्ष हैं। इसमें उच्च शिक्षण संस्थाओं की स्वायत्तता समाप्त करने के ऐसे प्रावधान हैं कि मुख्य विपक्षी कांग्रेस के साथ साथ कई उच्च शिक्षण संस्थान और भाजपा या उसकी सहयोगी पार्टी की सरकारें भी इसका विरोध कर रही हैं। आईआईटी कानपुर, संभलपुर, हैदराबाद ने इसका विरोध किया है। सरकारों की बात करें तो मेघालय मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश आदि ने विरोध किया है। कांग्रेस ने इसका विरोध किया है और पूरे विपक्ष से इसका विरोध करने को कहा है। अगर यह बिल पास होता है तो यूजीसी, एआईसीटीयू जैसी तमामं संस्थाएं बेमानी हो जाएंगी। सब कुछ सीधे शिक्षा मंत्रालय के नियंत्रण में होगा। संस्थाओं की स्वायत्तता इससे बुरी तरह से प्रभावित होगी।

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