Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

कांग्रेस प्रभारियों की राजनीति

कांग्रेस में प्रभारी महासचिव हमेशा बहुत शक्तिशाली रहे हैं। पार्टी आलाकमान प्रभारियों के हिसाब से ही फैसले करता है। कई बार तो ऐसा हुआ कि प्रदेश के नेताओं ने प्रभारी की शिकायत पार्टी आलाकमान से की और उनकी शिकायत दूर करने का काम प्रभारी को ही सौंप दिया गया। इससे शिकायत तो दूर नहीं होती थी नेता ही दूर हो जाते थे। कांग्रेस के कई नेता ऐसे किस्से सुनाते हैं कि किसी ने पार्टी आलाकमान से मिलने का समय मांगा, समय नहीं मिला तो उसने लिखित शिकायत भेजी और वह लिखित शिकायत मार्क होकर प्रभारी के पास पहुंच गई, जिसके बाद प्रभारी ने शिकायत करने वाले नेता को निपटा दिया। अपने नेताओं से सीधे बातचीत नहीं करने और फीडबैक नहीं से अक्सर ऐसा होता है। अभी कई राज्यों में यह देखने को मिलता है। हालांकि इसके अपवाद भी रहे हैं। कई बार प्रदेश अध्यक्ष या मुख्यमंत्र इतना पावरफुल होता है कि वह अपने हिसाब से प्रभारी को चलाता है। जैसे इस समय डीके शिवकुमार चला रहे हैं या जैसे कभी भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कमलनाथ आदि चलाते थे।

बहरहाल, भूपेश बघेल पंजाब के प्रभारी थे तो उन्होंने चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे तमाम बड़े नेताओं के विरोध को दरकिनार कर ऐलान कर दिया था कि अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ही प्रदेश अध्यक्ष रहेंगे। लेकिन जैसे ही बघेल की विधाई हुई वैसे नए प्रभारी सचिन पायलट ने वड़िंग को बदल दिया। अब पंजाब में खूब राजनीति चल रही है। हटने के बाद वड़िंग ने बघेल से मुलाकात की और उनका स्वागत किया। वड़िंग ने दिखाया कि उनको बघेल का समर्थन है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में अविनाश पांडेय को हटा कर राजेंद्र पाल गौतम को प्रभारी बनाया गया तो उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया अजय राय को हटाने का। इसमें वे कामयाब भी हो गए। वे इतने पावरफुल हैं कि उन्होंने अजय राय को हटवा कर मोना मिश्रा को अध्यक्ष और अपने करीबी इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनवा दिया। यह अलग बात है कि राजेंद्र पाल गौतम जिस जाटव समाज से आते हैं उसका एक फीसदी वोट भी वे कांग्रेस को नहीं दिलवा सकते हैं। लेकिन राहुल गांधी और उनके करीबियों को दलित, मुस्लिम राजनीति का गणित समझाने में सफल रहे हैं।

Exit mobile version