कर्नाटक में पिछले सोमवार यानी तीन अगस्त को 19 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई गई थी। उससे दो महीने पहले सरकार का गठन हुआ था, जब मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के साथ 13 मंत्रियों ने शपथ ली थी। मुख्यमंत्री को दो महीने लग गए अपने मंत्रिमंडल के बाकी सदस्यों को नियुक्त करने में। तब तक 14 लोगों से सरकार चल रही थी। कहने की जरुरत नहीं है कि ज्यादातर मंत्रियों को अंदाजा होगा कि उनके पास कौन सा मंत्रालय रहेगा और कौन सा चला जाएगा। इसलिए जो मंत्रालय जाने की संभावना होगी उसमें वे तदर्थ तरीके से काम कर रहे होंगे। कह सकते हैं कि कम से कम 19 मंत्रालयों में तदर्थ ढंग से काम होता रह। अब भी वहां ऐसे ही काम चल रहा है क्योंकि 19 नए मंत्रियों को शपथ दिलाने के बावजूद उनके विभागों का बंटवारा नहीं हुआ है। यह सिर्फ कर्नाटक का मामला नहीं है। पूरे देश में मुख्यमंत्री नियुक्त करने से लेकर मंत्रियों के चयन और विभागों के बंटवारे तक की पूरी प्रक्रिया मजाक बन कर गई है।
मुख्यमंत्री का फैसला पार्टी का आलाकमान करता है, मंत्रियों के नाम आलाकमान तय करता है और यहां तक कि मंत्रियों के विभाग भी आलाकमान की मंजूरी से तय होते हैं। पहले भी ऐसा होता होगा लेकिन तब यह काम चुपचाप होता था। ताकि मुख्यमंत्रियों की गरिमा और उनकी शक्ति बनी रहे। अब खुलेआम होता है। मुख्यमंत्री खुद ही कहता है कि वह आलाकमान की मंजूरी से मंत्रियों के नाम तय करेगा औऱ मंत्रियों की शपथ के बाद भी दिल्ली की दौड़ लगाता है ताकि विभागों का बंटवारा फाइनल हो। खबर है कि डीके शिवकुमार दिल्ली में हैं ताकि अपने नए 19 मंत्रियों के विभागों का अंतिम फैसला पार्टी आलाकमान की सहमति से करा सकें। उनकी 33 सदस्यों की सरकार में कोई भी महिला नहीं है। सो, एक खाली जगह पर किसी महिला विधायक को मंत्री बनाने के फैसले पर भी आलाकमान की मंजूरी लेनी है।
