एक तरफ उत्तर प्रदेश में भाजपा की सहयोगी पार्टियां ज्यादा सीटों के लिए दबाव बना रही हैं तो दूसरी ओर पंजाब में भारतीय जनता पार्टी अपनी सहयोगी अकाली दल के ऊपर ज्यादा सीटों के लिए दबाव बना रही है। भाजपा का दबाव बराबरी का समझौता करने के लिए है। भाजपा के नेता पंजाब में बिहार मॉडल पर समझौता चाहते हैं। उनका कहना है कि बिहार में नीतीश कुमार बहुत लोकप्रिय नेता थे और उनका सामाजिक आधार भी बड़ा था फिर भी भाजपा ने उनके साथ बराबरी का समझौता किया क्योंकि राज्य में हालात बदल गए थे और भाजपा एक बड़ी ताकत के तौर पर स्थापित हो गई थी। उसी तरह से भाजपा के नेता पंजाब में समझौता चाहते हैं।
गौरतलब है कि भाजपा और अकाली दल आखिरी बार 2017 के विधानसभा चुनाव और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में एक साथ लड़े थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में पंजाब की 117 में सिर्फ 23 सीटों पर भाजपा लड़ी थी। बाकी सीटों पर अकाली दल लड़ी थी। 2022 का विधानसभा चुनाव दोनों ने अलग अलग लड़ा और पूरी तरह से साफ हो गए। उस चुनाव में अकाली दल को 18 फीसदी से थोड़ा ज्यादा और भाजपा को 13 फीसदी से थोड़ा ज्यादा वोट मिला। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह से बदल गई। भाजपा को 18 फीसदी और अकाली दल को साढ़े छह फीसदी के करीब वोट मिले। इसी आधार पर भाजपा चाहती है कि वह 59 सीट लड़े और अकाली दल 58 सीटों पर लड़े। दूसरी ओर अकाली दल का कहना है कि विधानसभा में उसे ज्यादा सीट लड़ना चाहिए। भाजपा इस बार बहुकोणीय मुकाबले में 38 फीसदी हिंदू वोट और शहरी सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद कर रही है।
