क्या राम माधव ने भाजपा के अंदर अपनी वापसी की संभावना पर खुद ही पानी फेर दिया है? कह नहीं सकते हैं क्योंकि पार्टी में कोई बड़ा पद देने का क्राइटेरिया अलग होता है। लेकिन इतना जरूर हुआ है कि राम माधव की एक बौद्धिक नेता होने की छवि को नुकसान हुआ है। वह नुकसान पूर्वोत्तर में प्रभारी रहने के दौरान भी हुआ था और अब अमेरिका में एक पैनल डिस्कशन के दौरान सच बोलने की वजह से भी हुआ है। कूटनीति का यह पहला सबक होता है कि या तो सच मत बोलो या बोलो तो इस अंदाज में कि आम लोगों को समझ में नहीं आए। लेकिन राम माधव ने बिल्कुल सपाट अंदाज में सच कह दिया।
उन्होंने एक पैनल में डिस्कशन में कहा कि भारत ने अमेरिका के लिए क्या क्या नहीं किया। राम माधव ने कहा कि अमेरिका के कहने पर ईरान से तेल खरीदना बंद किया और रूस से भी तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जताई। फिर भी अमेरिका भारत के साथ अच्छा बरताव नहीं करता है। जब इस पर विवाद हुआ और कांग्रेस व दूसरी विपक्षी पार्टियों ने कहना शुरू कर दिया कि प्रधानमंत्री मोदी वैसे ही करते हैं, जैसा अमेरिका कहता है तो इतने ही दो टूक अंदाज में राम माधव ने कहा कि उन्होंने गलतबयानी की थी और इसका उनको अफसोस है।
सवाल है कि इसमें क्या गलतबयानी है? अमेरिका ने ईरान पर पाबंदी लगाई तो भारत ने ईरान से तेल खरीदना पूरी तरह से बंद कर दिया। ऐसे ही रूस से तेल खरीदना बंद करने को कहा तो भारत ने खरीद काफी कम कर दी। फिर अमेरिका ने रूस और ईरान से तेल खरीदने की अनुमति दी तो भारत ने दोनों से खरीदना शुरू कर दिया। यह मैटर ऑफ फैक्ट है। तभी राम माधव ने जो किया उसमें कुछ न कुछ तो गड़बड़ है। अगर कोई दूसरा मकसद नहीं होता तो वे पहले ही यह सच बयान नहीं करते और अगर कर दिया था तो अपने ही बयान को गलत बता कर खेद नहीं जताते।
