यह हैरान करने वाली बात है कि जिस समय कर्नाटक कांग्रेस का विवाद सुलझता दिख रहा था उसी समय नई चर्चा शुरू हो गई है। अब कहा जा रहा है कि उप मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने मुख्यमंत्री बनाने के लिए पार्टी आलाकमान पर दबाव बढ़ा दिया है। बताया जा रहा है कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ के लिए दो तारीखें भी तय करा ली हैं। अपने निजी ज्योतिषी की सलाह पर शिवकुमार ने 21 और 26 नवंबर की तारीख तय कराई है। यह खबर कर्नाटक के एक कन्नड़ अखबार में छप गई, सिद्धारमैया सरकार के ढाई साल पूरे होने पर सत्ता परिवर्तन होगा। इसके बाद अफरातफरी मची है। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इससे काफी परेशान हैं। हालांकि शिवकुमार ने अपनी ओर से ऐसा कोई दावा नहीं किया है। फिर भी बेंगलुरू से लेकर दिल्ली तक राजनीति गरमा गई है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक के पत्रकारों ने जब इस बात की जानकारी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को दी तो वे बिल्कुल अचंभित रह गए। उन्होंने पत्रकारों से पूछा कि आपको कैसे पता चला कि डीके शिवकुमार ने शपथ की तारीख तय की है। इस पर पत्रकारों ने कहा कि कन्नड़ के एक अखबार में खबर छपी है। सिद्धारमैया को तब भी विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि वे कन्नड़ के सारे अखबार पढ़ते हैं लेकिन उन्होंने यह खबर कहीं नहीं देखी। तब पत्रकारों ने उनके मैसुरू के एक कन्नड़ अखबार के बारे में बताया, जिसमें यह खबर छपी थी। उस अखबार का नाम सुन कर मुख्यमंत्री खामोश हो गए और उसके बाद बिना कुछ बोले उस कार्यक्रम से चले गए। ध्यान रहे मैसुरू मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का अपना इलाका है।
बताया जा रहा है कि शिवकुमार को उनके ज्योतिषी ने बताया है कि अगर वे अभी मुख्यमंत्री नहीं बनते हैं तो कभी नहीं बनेंगे। इस अभी नहीं तो कभी नहीं वाली बात से डीके शिवकुमार परेशान हुए हैं। ध्यान रहे कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था कि उनका समय अभी नहीं आया है और 2028 में वे फिर से कांग्रेस की सरकार बनवाएंगे तब मुख्यमंत्री बनेंगे। लेकिन अब स्थितियां बदल रही हैं। उनके यह बात कहने के बाद सिद्धारमैया, उनके बेटे यतींद्र, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और उनके बेटे प्रियांक खड़गे और इन सबके चहेते मंत्री सुरेश जरकिहोली ने जिस तरह की राजनीति की है उससे शिवकुमार और उनके समर्थक आशंकित हुए हैं। अहिंदा राजनीति के तहत पिछड़ा, दलित और मुस्लिम की राजनीति को मजबूत करने के लिए आरएसएस पर पाबंदी लगाने के बयानों सहित कई प्रयास हो रहे हैं। मुस्लिम लेखिका बानू मुश्ताक को मैसुरू दशहरा समारोह के उद्घाटन के लिए बुलाना इसी राजनीति का हिस्सा था।
डीके शिवकुमार और उनके समर्थकों को लग रहा है कि इस राजनीति के जरिए उनको किनारे करने का प्रयास हो रहा है। ध्यान रहे शिवकुमार की राजनीति वोक्कालिगा वोट पर आधारित है और उसके बाद सॉफ्ट हिंदुत्व उनकी ताकत है। दूसरी ओर हिंदुत्व की पूरी तरह से खारिज करके सिद्धारमैया और उनकी टीम राजनीति करती है। इससे शिवकुमार के लिए बहुत असहज स्थिति है। तभी सवाल है कि क्या वे भाजपा के साथ जा सकते हैं? क्या वे दक्षिण भारत में भाजपा के हिमंत बिस्वा सरमा हो सकते हैं? भाजपा ने हालांकि पिछली बार जनता दल ये आए बसवराज बोम्मई के मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन वोक्कालिगा और लिंगायत के बहुत स्पष्ट विभाजन के कारण वहां भी समस्या आ सकती है। तभी उधर जाने की बजाय शिवकुमार कांग्रेस में रह कर अपने को मुख्यमंत्री बनाने का दबाव बनाए हुए हैं।
