भारत में बहुत सारे फैसलों से पहले लोगों को आजमाया जाता है। मीडिया में कुछ खबरें दी जाती हैं। उन पर लोगों की प्रतिक्रिया देखी जाती है और तब नीतिगत फैसला होता है। कई मामलों में ऐसा हुआ है। ताजा मामला यूपीआई के जरिए होने वाले ट्रांजेक्शन यानी डिजिटल लेन देन पर शुल्क लगाने का है। पिछले दिनों खबर आई कि सरकार डिजिटल लेन देन पर शुल्क लगाने जा रही है क्योंकि इस पर बहुत खर्च हो रहा है। अभी ग्राहक या दुकानदार को शुल्क नहीं देना होता है। उस पर 20 हजार करोड़ रुपए का खर्च सरकार करती है। जाहिर है 140 करोड़ नागरिकों को एक सुविधा देने के लिए इतना खर्च करना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन सरकार शुल्क लगाना चाहती है।
इसकी खबर आने के बाद लोगों ने सोशल मीडिया में इसका विरोध किया। जब खूब विरोध हो गया तो सरकार ने फैसला वापस करने के अंदाज में कहा है कि ग्राहकों को कोई शुल्क नहीं देना होगा और छोटे दुकानदारों को भी उनके लेन देन पर कोई चार्ज नहीं देना होगा। जनता खुश हो गई क्योंकि सरकार ने कहा कि बड़े दुकानदारों और बड़े लेन देन पर ही शुल्क लगेगा। अब सवाल है कि छोटे लेन देन पर हो या बड़े पर, दुकानदार कहां से शुल्क देगा? क्या सरकार यह कह रही है कि दुकानदार अपना मुनाफा घटा कर शुल्क भरेगा? ऐसा नहीं होता है। दुकानदार जो शुल्क चुकाएगा वह ग्राहक से ही वसूलेगा। इसलिए ग्राहकों को ज्याद खुश होने की जरुरत नहीं है। सीधे की बजाय सरकार ने घुमा कर नाक पकड़ने का फैसला किया है।
