Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

अदालत के सवाल और असली फैसले

New Delhi, May 22 (ANI): A view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Thursday. (ANI Photo/Rahul Singh)

बहुत समय पहले मशहूर कानूनविद् एजी नूरानी ने ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका में ‘टॉकिंग जजेज’ शीर्षक से एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि आज कल अदालतों में सुनवाई के दौरान जज बहुत बोलने लगे हैं। जजों का काम बोलना नहीं होता है। नूरानी का कहना था कि जज बोल ज्यादा रहे हैं और उनके फैसलों की गुणवत्ता खराब होती जा रही है। पहले के विद्वान जज जैसे फैसले लिखते थे, जो नजीर बनती थी वैसे फैसले अब नहीं हो रहे हैं। एजी नूरानी तो अब रहे नहीं, रहते तो देखते कि आज कल अदालतों में क्या हो रहा है। इन दिनों एक नया ही ट्रेंड देखने को मिला है। अदालतें सुनवाई के दौरान बड़ी सख्ती दिखाती हैं। सरकार से तल्ख सवाल पूछती हैं लेकिन अंत में फैसला सरकार या सत्तारूढ़ दल के पक्ष में ही जाता है।

ताजा मिसाल पश्चिम बंगाल के ऋतब्रत मुखर्जी का है। उनको आनन फानन में विधानसभा के स्पीकर ने नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी थी। वे ममता बनर्जी की पार्टी से टूटे 60 विधायकों का नेतृत्व कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने सुनवाई में बड़े तल्ख सवाल पूछे और कहा कि इतनी जल्दबाजी में क्यों फैसला किया गया। लेकिन अगले ही दिन फैसला आया कि ऋतब्रत को नेता प्रतिपक्ष बनाने का फैसला सही है। इसी तरह टेलीग्राम पर पाबंदी के केंद्र सरकार के फैसले पर अदालत ने सख्त रुख दिखाया और पूछा कि पूरा ऑपरेशन क्यों प्रतिबंधित किया गया? लेकिन अगले दिन फैसले में लिखा कि प्रतिबंध बिल्कुल सही है। एक अदालत ने कहा है कि फुटपाथ पर चलना लोगों का मौलिक अधिकार है। इस पर खूब मीम्स बन रहे हैं। लोग बंगाल की मतदाता सूची से नाम कटने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी याद दिला रहे हैं कि फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकार है लेकिन वोट देने का क्या है, इस बार नहीं दिया तो अगली बार दे देंगे।

Exit mobile version