ओह! भारत तब और अब! तब भारत गुल्ली डंडा खेलता था। अब क्रिकेट का सट्टा खेलता है। तब खेलना कर्म था, जिंदादिली थी, अब देखना है, लूटा जाना है। तब हर वह काम होता था जो मनुष्य (खासकर ‘कर्म’ के हिंदू फलसफे की अनिवार्यता में) अस्तित्व की तासीर है। तब कर्मवीर नेहरू थे। भारत कर्मशील था। नेहरू के स्टाफ में स्टेनोग्राफरों की भीड़ थी। वे घंटों डिक्टेशन देते, नोट लिखाते, दस्तखत करते, उसी से फाइलें, योजनाएं और रोडमैप बनते थे। मंत्री भी तब ऐसे ही काम करते थे। इसलिए नेहरू के कार्यकाल और मोदी राज की फाइलों की पचास साल बाद जब आर्काइवल रिकॉर्ड से तुलना होगी तो नेहरू की हर फाइल पर जहां उनका नोट, उनकी टिप्पणी मिलेगी, वहीं नरेंद्र मोदी की फाइलों में केवल उनकी तरफ से अफसरों के दस्तखतों की नोटशीट होगी।
नेहरू का समय काम का था। तब सरकार और राज्यों की भी सरकारें काम करती थीं। वही फर्क है जो गुल्ली डंडा खेलने बनाम क्रिकेट देखने और उसके सट्टे का है। भारत तब खेलता था। हॉकी और फुटबॉल भी खेलता था। इन दिनों दुनिया फुटबॉल खेल रही है। विश्व कप में 48 देशों की टीमें हैं। और पता है 2026 का आज भारत फुटबॉल में कहां है? वह 136वें स्थान पर है! वही नेहरू के समय कहां था? 1956 के मेलबोर्न ओलंपिक के फुटबॉल में तब भारत चौथे स्थान पर था!
नेहरू का भारत खेलता था। पढ़ता था। असल परीक्षाएं देता था। नौजवान असल नौकरियां पाता था। कुंजियों, कोचिंग, पेपर लीक, नकल की पढ़ाई नहीं थी। खेल की अकादमियां नेहरू ने ही बनाई थीं। उन्होंने ही स्कूल, अस्पताल, कारखाने खोले थे। नेहरू के पास काम ही काम था। अंग्रेजों से स्वतंत्र हुआ भारत गरीब था। अनाज की कमी थी। लोग भूखे, गरीब थे। इसलिए नेहरू ने खेतिहरों को खेती की जमीन बांटी। उन्होंने खेती के लिए पंचवर्षीय योजना बनाई। हरित क्रांति के लिए अमेरिका, मेक्सिको से बीज और अनाज मंगवाने के फैसले हुए। नेहरू ने खाद के कारखाने बनाए। दूध के लिए सहकारी समितियां बनवाईं। नेहरू के शासन के दिनों का यदि दिन-प्रतिदिन का रिकॉर्ड निकाला जाए तो शायद नरेंद्र मोदी ने अपने शासन में जितने दिन मन की बात, भाषणबाजी में गुजारे, उससे ज्यादा दिन नेहरू के योजनाओं के निर्माण, उद्घाटनों, कारखानों के उत्पादन प्रारंभ, बांधों से पानी छोड़े जाने, सिंचित भारत बनवाने में मिलेंगे। नेहरू न केवल खुद पंचवर्षीय, सालाना योजनाएं बनवाते थे, बल्कि वे आए दिन भाखड़ा बांध, स्टील कारखानों, ट्रॉम्बे की एटमी भट्टी जैसे निर्माणों के उद्घाटनों के साथ उन्हें भारत के मंदिर, नए तीर्थ बताते थे।
तब जिंदगी जीने के मंदिर बनते थे, न कि परलोक सुधारने के मंदिर! और ऐसा नेहरू और नेहरू की विरासत के इंदिरा गांधी, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह आदि सभी ने सच्चाई के सच्चे कर्म में किया। न छल था, न धोखा था, न दिखावा था।
2014 से पहले का भारत भीड़ नहीं था। नेहरू मनुष्य थे और लोग भी मनुष्य। न कॉकरोच, न भक्त और न देशद्रोही। तीस-चालीस करोड़ लोगों का भारत तब एक था। जिंदा, जिंदादिल और अपने को बनाने के लिए दिन-रात मेहनत में खपता हुआ। तब लाभार्थी, हरामखोर, अंधविश्वासी, अज्ञानी, बेवकूफी में जीने वाली गंवार लोगों की भीड़ की भेड़चाल नहीं थी। तब लोकसभा में नेहरू के आगे राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, एमवी कामथ, महावीर त्यागी ऐसे खुद्दार, निर्भयी विपक्षी नेता हुआ करते थे। ये नेहरू की भी बोलती बंद कर देते थे। लेकिन नेहरू ने कभी इनके पीछे सीबीआई, ईडी नहीं छोड़ी। तब अखबारों में नेहरू के मजाक के शंकर के कार्टून होते थे। कटु आलोचना छपती थी। नेहरू और उनके मंत्री शर्मदार थे। 1962 में भारत हारा था तो खुद नेहरू ने अपनी जुबान से गलती मानी। सेना की अक्षमता, नुकसान को छुपाया नहीं। रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन को हटाया। जांच आयोग बना। रेल दुर्घटना हुई तो लाल बहादुर शास्त्री ने अपने पद से इस्तीफा दिया। तब भ्रष्टाचार के छोटे-छोटे आरोपों पर भी बड़े इस्तीफे होते थे।
तब बेशर्म सरकार नहीं थी। ढाई प्रतिशत की हिंदू विकास दर भी दुनिया की निगाहों में असल थी। ढाई प्रतिशत का विकास अभूतपूर्व बचत दर की वैश्विक पहचान लिए हुए था। तब न भारत उधार पर जिंदा था और न घर-परिवार कर्ज, उधारी की जिंदगी जीने को जीना मानते थे। तब सड़क, बिजली, पानी की चिंता थी तो बांध बनाने, घर-घर पानी की पाइपलाइन बिछने का नागरिक अनुभव था। बिजली की कमी थी तो नेहरू ने जहां सरकारी कारखाने बनाए, वहीं ट्रांसमिशन लाइनें भी बिछवाईं ताकि लोगों को कुछ पैसे प्रति यूनिट की सस्ती बिजली मिले। तब लोगों को बिजली, सड़क, पानी, स्कूल, अस्पताल, एयरपोर्ट आदि सभी जरूरतों का बुनियादी ढांचा लगभग फ्री में प्राप्त था।
क्या मैं गलत हूं? मैं नेहरू, उनके आइडिया ऑफ इंडिया, समाजवाद आदि का घोर विरोधी रहा हूं। पर बतौर सनातनी हिंदू, बतौर नागरिक, बतौर एक राष्ट्रवादी मैं इतना, ऐसा अहसानफरामोश नहीं हो सकता जो पिछले बारह वर्षों की रियलिटी के आगे उस सत्य को भुला दूं जिसे जिंदादिल, स्वाभिमानी, चरित्रवान भारत ने जिया है। जिससे कौम, नस्ल की रियल वैश्विक पहचान थी। फर्जी या झूठी नहीं। भले वह मेलबोर्न ओलंपिक में भारतीय टीम की फुटबॉल की किक हो या 560 राजे-रजवाड़ों के विलय से गठित भारत के नक्शे की उपलब्धि की, या लगातार एक के बाद स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनावों की बेमिसाल लोकतांत्रिक उपलब्धि की थी।
