विपक्षी पार्टियों के गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक की एक बैठक आठ जून को दिल्ली में हुई थी। ममता बनर्जी इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली आई थीं। मई में पश्चिम बंगाल का चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी विपक्ष की एकजुटता की बात कर रही थीं और इसलिए बैठक में शामिल हुईं। लेकिन दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल इस बैठक में शामिल नहीं हुए थे। तमिलनाडु में मई चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हुई डीएमके ने भी बैठक का बहिष्कार किया था। डीएमके की नाराजगी इस बात से थी कि कांग्रेस ने चुनाव नतीजों के तुरंत बाद उसका साथ छोड़ दिया और टीवीके से मिल कर सरकार में शामिल हो गई। डीएमके ने कांग्रेस पर गद्दारी का आरोप लगाया था। आठ जून को हुई इस बैठक में तय किया गया था कि हर दो महीने पर ‘इंडिया’ ब्लॉक की मीटिंग होगी। यह भी तय कर लिया गया था कि अगली बैठक हैदराबाद में होगी।
आठ जून की बैठक में तय किया गया था कि अगस्त के पहले हफ्ते में हैदराबाद में बैठक होगी। लेकिन अब सितंबर का पहला हफ्ता चल रहा है और विपक्ष की ओर से किसी बैठक की कोई पहल नहीं हुई है। यहां तक कि इस बारे में कोई चर्चा भी नहीं हुई है। जानकार नेताओं का कहना है कि जिस तरह से 2024 का चुनाव हारने के बाद विपक्षी गठबंधन की सारी पार्टियों ने ‘इंडिया’ ब्लॉक को भुला दिया था वैसे ही फिर भुला दिया गया है। गौरतलब है कि चार जून 2024 को लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के अगले दिन पांच जून को विपक्ष की औपचारिक बैठक हुई थी। उसके दो साल तीन दिन के बाद फिर आठ जून 2026 को बैठक हुई। अब फिर विपक्ष के नेता इस गठबंधन को भूल गए हैं। सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है कि जो गठबंधन इतने धूमधड़ाके से बना था कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर देकर उसका बहुमत कम कर दिया था, उस गठबंधन को बनाए रखने का गंभीर प्रयास नहीं हो रहा है?
असल में गठबंधन की पार्टियों में अंदरखाने खींचतान चल रही है और एक तरह से गठबंधन बिखर गया है। डीएमके और आम आदमी पार्टी ने ‘इंडिया’ ब्लॉक से दूरी बना ली है। हालांकि कांग्रेस और आप के बीच गोवा में तालमेल की चर्चा चल रही है लेकिन कांग्रेस नेताओं का मानना है कि अभी आप के साथ दिखने का पंजाब के चुनाव में बुरा असर हो सकता है। ऐसे ही बिहार में विधानसभा चुनाव के बाद राजद और कांग्रेस का तालमेल बिगड़ा है। शरद पवार की एनसीपी को लेकर भी पार्टियों में संशय है। कांग्रेस के एक जानकार नेता का कहना है कि गठबंधन में कोई प्रादेशिक नेता इसलिए पहल नहीं कर रहा है क्योंकि उसको लग रहा है कि 2024 के चुनाव में कांग्रेस की सीटें बढ़ने के बाद अब कांग्रेस विपक्ष की गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर आ गई है और अब कांग्रेस की जिम्मेदारी है कि वह सभी पार्टियों से तालमेल करके उनको एक प्लेटफॉर्म पर रखे। लेकिन कांग्रेस के साथ समस्या यह है कि राहुल गांधी समझ रहे हैं कि वे अकेले भाजपा से लड़ रहे हैं फिर प्लेटफॉर्म साझा करके बाकी पार्टियों को क्रेडिट क्यों दिया जाए। इस वजह से तालमेल नहीं बन रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने ही पहले भी यह सुनिश्चित किया कि विपक्षी गठबंधन का कोई औपचारिक ढांचा नहीं बने। तभी इसका कोई सचिवालय भी नहीं बन पाया है। संयोजक तय करने का काम भी नहीं हुआ।
