दिल्ली की भाजपा सरकार ने 2025 के जनवरी में हुए विधानसभा चुनाव में महिलाओं को सम्मान के नाम पर हर महीने ढाई हजार रुपए देने का वादा किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार में कहा था कि आठ मार्च 2025 को महिला दिवस के दिन महिलाओं के खाते में पैसे आ जाएंगे। गौरतलब है कि फरवरी 2025 में भाजपा की सरकार बन गई लेकिन अगस्त 2026 तक महिलाओं को पैसे मिलने नहीं शुरू हुए हें। अब राज्य सरकार ने लक्ष्मी योजना के नाम से इसके लिए फॉर्म भरवाना शुरू किया है। लेकिन उससे पहले इस योजना का लाभ लेने के लिए दिल्ली सरकार ने जो शर्तें लगाई हैं और जो अर्हता तय की है वह कमाल की है। उसका मकसद साफ दिख रहा है कि महिलाओं को इस योजना में शामिल करने के लिए नहीं, बल्कि अधिक से अधिक महिलाओं को इस योजना से बाहर रखने के लिए ये शर्तें रखी गई हैं। तभी ऐसा लग रहा है कि आने वाले दिनों में इस योजना का दस्तावेज हर राज्य में देखा जाएगा और सरकारों के लिए इसे मॉडल बना कर महिला सम्मान की योजनाओं को बदला जाएगा।
इस योजना के लिए अपने को पात्र सिद्ध करने के लिए महिलाओं को 10 तरह के दस्तावेज जमा कराने होंगे। इनमें एक दस्तावेज स्थानीय विधायक या सांसद का पत्र होगा। यह वैकल्पिक नहीं है, बल्कि अनिवार्य है। कहा जा रहा है कि स्थानीय विधायक और सांसद अपने क्षेत्र के लोगों को जानते हैं। वास्तविकता यह है कि दिल्ली में कोई भी विधायक अपने चुनाव क्षेत्र के 10 फीसदी से ज्यादा लोगों को नहीं जानता होगा। हर विधानसभा में औसतन दो लाख से ज्यादा मतदाता हैं। उनमें से 20 हजार से ज्यादा को कोई भी विधायक नहीं जानता होगा। हर सांसद के क्षेत्र में औसतन 20 लाख से ज्यादा मतदाता हैं। यह कहने में कोई संदेह नहीं है कि कोई भी सांसद दो लाख मतदाताओं को नहीं जानता होगा। इसलिए यह बेहूदा तर्क है। इसका मकसद सिर्फ यह है कि भाजपा के स्थानीय नेता आदि अपने जानने वालों को विधायक या सांसद की चिट्ठी दिलाएंगे और उन्हें लाभ मिलेगा। ये स्थानीय नेता सुनिश्चित करेंगे कि दूसरी पार्टी के समर्थकों को कम से कम इसका लाभ मिले।
दिल्ली लक्ष्मी योजना की एक और अजीब शर्त यह है कि आवेदन करने वाली महिला को दिल्ली में कम से कम 10 साल तक रहने का प्रमाणपत्र देना होगा। सोचें, यह कैसे संभव होगा? अगर कोई महिला शादी के बाद या कामकाज के सिलसिले में एक साल पहले आई हो और यहां उसका मतदाता पहचान पत्र और आधार बना हुआ हो तब भी उसे इस योजना का लाभ नहीं मिल पाएगा। किराए पर रहने वाले और लगातार घर बदलने वाले या निर्माण स्थलों पर रहने वाली मजदूर महिलाएं कहां से 10 साल का आवास प्रमाणपत्र देंगी? इसमें एक सामान्य शर्त यह है कि परिवार की सालाना आया ढाई लाख रुपए से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। जब यह शर्त है तो फिर पता नहीं क्यों एक शर्त बिजली के उपभोग की रखी गई है। साथ ही यह भी शर्त लगाई गई है कि बिजली का मीटर उस परिवार के मुखिया के नाम से होना चाहिए, जिस परिवार की महिला आवेदन कर रही है। सोचें, किरायदार, प्रवासी मजदूर आदि कैसे इस शर्त को पूरा करेंगे? इसी तरह एक शर्त आवेदन करने वाली महिला परिवार की सबसे बड़ी महिला होनी चाहिए। घर में किसी की सरकारी नौकरी नहीं होनी चाहिए और आमदनी ढाई लाख से ज्यादा न हो, इसके अलावा हर शर्त का मकसद महिलाओं की संख्या कम करना है। दिल्ली सरकार कह रही थी कि दिल्ली की 70 लाख से ज्यादा महिला मतदाताओं में से 17 लाख को इसका लाभ मिलेगा लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि संख्या और भी कम होगी।
