पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों और असम की एक लोकसभा सीट के नतीजों का संदेश यह है कि अब मुस्लिम भी भाजपा को वोट दे रहे हैं और साथ ही अपने नेता की तलाश भी कर रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो भाजपा किसी स्थिति में रेजीनगर विधानसभा सीट नहीं जीत सकती थी और नगांव लोकसभा सीट पर भी उसका जीतना मुमकिन नहीं था। लेकिन नगांव सीट पर भाजपा न सिर्फ जीती, बल्कि दूसरे स्थान पर रहे एआईयूडीएफ के नेता बदरूद्दीन अजमल और कांग्रेस की शिबोमणी बोरा दोनों को मिला कर जीतने वोट मिले उससे ज्यादा वोट भाजपा के देबाशीष शर्मा को मिले। इसी तरह की स्थिति रेजीनगर सीट पर भी रही। वहां तो सभी विपक्षी पार्टियां मिल कर भी भाजपा उम्मीदवार को मिले वोट से बहुत पीछे रहीं। यह बहुत दिलचस्प परिघटना है, जिस पर विचार करने की जरुरत है।
गौरतलब है कि असम में मुस्लिम मतदाताओं ने पहले कांग्रेस को छोड़ कर अजमल की पार्टी का साथ दिया था लेकिन पिछले दो चुनावों में उसने अजमल को छोड़ा और कांग्रेस के साथ खड़े हुए तभी इस बार कांग्रेस के 19 में से 18 विधायक मुस्लिम जीते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में धुबरी सीट पर कांग्रेस के हाथ अजमल 10 लाख से ज्यादा वोट से हारे थे। लेकिन अब फिर ऐसा लग रहा है कि मुस्लिम अजमल के साथ जा रहे हैं। अजमल साढ़े पांच लाख से ज्यादा वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे, जबकि कांग्रेस सवा लाख वोट के साथ बहुत पीछे तीसरे स्थान पर रही।
ध्यान रहे कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस या लेफ्ट किसी ने भी यह नहीं कहा है कि असम की नगांव या पश्चिम बंगाल की रेजीनगर और नंदीग्राम सीट पर वोट चोरी करके भाजपा जीती है। दबी जुबान में कुछ नेता बोल रहे हैं लेकिन पार्टियों ने नतीजे को स्वीकार किया है। असम की नगांव सीट कांग्रेस के प्रद्योत बोरदोलोई के इस्तीफे से खाली हुई थी। वहां से भाजपा ने पूर्व आईएएस अधिकारी देबाशीष शर्मा को टिकट दिया। वे नगांव के कलेक्टर रह चुके हैं और निजी तौर पर बहुत लोकप्रिय हैं। कहा जा रहा है कि इस वजह से मुस्लिम वोट उनको मिले। ध्यान रहे नगांव में मुस्लिम आबादी 60 फीसदी के करीब है। वहां से असम के सबसे बड़े मुस्लिम नेता बदरूद्दीन अजमल खुद लड़ने पहुंचे थे। लेकिन वे जीत नही सके। उन्होंने कांग्रेस को तो तीसरे स्थान पर पहुंचा दिया पर देबाशीष शर्मा को हरा नहीं पाए। शर्मा डेढ़ लाख वोट से जीते। उनको 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिली। जाहिर है मुस्लिम समर्थन के बगैर वे इतना वोट नहीं ले सकते थे।
जहां तक रेजीनगर की बात है तो वहां हिंदू आबादी 30 फीसदी के करीब है। लेकिन भाजपा के उम्मीदवार को 50 फीसदी के करीब वोट मिले। अगर यह मान लिया जाए कि एक एक हिंदू वोट उन्हीं को मिला तब भी कम से कम 20 फीसदी मुस्लिम वोट उनको मिला है। यह बहुत दिलचस्प परिघटना है। यह मुर्शिदाबाद जिला है, जहां बेलडांगा में हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखी और मई के चुनाव में रेजीनगर सीट पर 65 हजार वोट से जीते, उस सीट पर उनके बेटे गुलाम नबी आजाद को भाजपा ने 75 हजार वोट से हराया। हुमायूं कबीर की पार्टी दूसरे स्थान पर रही। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट तीनों के लिए यह बहुत ज्यादा चिंता की बात होनी चाहिए। तीनों को मिला कर भी 10 हजार वोट नहीं आए। असम की नगांव और पश्चिम बंगाल की रेजिनगर सीट का मैसेज कांग्रेस और दूसरी सेकुलर पार्टियों के लिए बहुत खराब है। कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं की पार्टियों को अब मुस्लिम बहुल इलाकों में ज्यादा समर्थन मिलेगा। पहले मुस्लिम सेकुलर पार्टियों को इसलिए वोट देता था क्योंकि उसको लगता था कि ये पार्टियां कुछ हिंदू वोट लेकर भाजपा को हरा सकती हैं। लेकिन अगर हिंदू इन पार्टियों को वोट नहीं दे रहा है तो फिर मुस्लिम भी अपनी पार्टी और अपना नेता खोज कर उसे वोट देंगे।
