भारतीय जनता पार्टी सहित कई पार्टियों ने तय किया है कि सोशल मीडिया में लोकप्रिय नेताओं को पार्टी संगठन में जगह मिलेगी और उनको टिकट देने में भी प्राथमिकता दी जाएगी। बहुत साल पहले भाजपा ने 50 हजार फॉलोअर्स की सीमा तय की थी। कहा गया था कि सोशल मीडिया में जिनके पास इतने फॉलोअर्स होंगे उन्हीं को टिकट के लिए आवेदन करना चाहिए। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी के नेताओं को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स व फेसबुक के साथ साथ इंस्टाग्राम पर भी सक्रिय होने को कहा क्योंकि इंस्टाग्राम पर ज्यादा युवा सक्रिय रहते हैं।
लेकिन राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनाव में कम से कम एक सीट की ऐसी मिसाल बनी है, जिसे देख कर सभी पार्टियों को अपनी रणनीति पर नए सिरे से सोचने की जरुरत है। जोधपुर की एक सीट पर एक सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर चुनाव लड़ा, जिसके 21 लाख फॉलोअर्स थे। लेकिन चुनाव में उसे सिर्फ 33 वोट मिले। हालांकि जितने फॉलोअर्स उसके पास थे उतने में उसको भाजपा या कोई भी पार्टी टिकट दे सकती थी। उसको मिले वोट से पता चलता है कि सोशल मीडिया में सब्सक्राइबर और फ़ॉलोअर्स का कई बार कोई खास मतलब नहीं होता है। वे किसी और प्रदेश के या किसी और देश के हो सकते हैं। या राजनीतिक मामलों से पूरी तरह उदासीन भी हो सकते हैं। इसलिए नेताओं और पार्टियों को जमीनी काम पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
