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यूजीसी का दिशानिर्देश कानून नहीं बनेगा

New Delhi, Aug 26 (ANI): RSS Chief Mohan Bhagwat addresses the gathering during an event to mark 100 years of Rashtriya Swayamsevak Sangh at Bharat Mandapam, in New Delhi on Tuesday. (ANI Photo/Ishant Chauhan)

यह बात राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ यानी आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने कही है। वे एक जैन धर्मगुरू से मिलने गए थे, जहां उनसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यूजीसी के समानता वाले दिशानिर्देशों के बारे में पूछा गया था। उन्होंने दो टूक अंदाज में कहा कि यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता बनाने का जो दिशानिर्देश जारी किया है वह अभी कानून नहीं बना है और कभी भी कानून नहीं बनेगा। उनका यह बयान बहुत बड़ा है और इससे दो सवाल उठते हैं। पहला सवाल तो यह है कि क्या मोहन भागवत की सरकार में कोई ऑथोरिटी है, जो वे कह रहे हैं कि यह कभी कानून नहीं बनेगा या सरकार के किसी व्यक्ति ने उनसे ऐसी बात कही है? अनौपचारिक रूप से सब जानते हैं कि भाजपा के ऊपर संघ का क्या असर है। लेकिन क्या औपचारिक रूप से संघ प्रमुख इस तरह की घोषणा कर सकते हैं? दूसरा सवाल यह है कि अभी यह ऐलान करने की जरुरत क्यों पड़ी है?

गौरतलब है कि यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों के कैम्पस में कथित तौर पर समानता बहाल करने के लिए इस साल फरवरी में एक नया दिशानिर्देश जारी किया था। उसे लेकर बहुत तीव्र विरोध हुआ क्योंकि उससे ज्यादा असमानता बनाने वाला और भेदभाव को बढ़ाने वाला सरकारी निर्देश आज तक आजाद भारत में नहीं जारी हुआ था। वह दिशानिर्देश कैम्पस में प्रवेश से पहले ही सामान्य वर्ग के छात्र को अपराधी बना देने वाला है। अगर ये निर्देश लागू हो जाते तो किसी भी सामान्य वर्ग के छात्र को, जिसकी दाखिले के समय 18 साल के आसपास उम्र होगी उसे उत्पीड़न के आरोप में फंसाया जा सकता था। फंसाने वाले के आरोप अगर गलत निकलते तब भी उसके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं होती। सो, जैसे ही ये निर्देश जारी हुए वैसे ही इसका विरोध हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने इस पर रोक लगा दी। पिछले सात महीने से यथास्थिति बनी हुई है और भेदभाव रोकने का 2012 का पुराना दिशानिर्देश लागू है।

इसलिए सात महीने बाद मोहन भागवत ने ऐलान किया है कि यह कभी कानून नहीं बनेगा इसका अर्थ है कि अब सामान्य वर्ग के लोगों की नाराजगी की आंच संघ और भाजपा दोनों को महसूस होने लगी है। उनको लगने लगा है कि वे सामान्य वर्ग को नाराज कर अपनी ताकत गंवा रहे हैं। धारणा के स्तर पर, मीडिया और सोशल मीडिया में समर्थन के स्तर पर और राजनीतिक व चुनावी स्तर पर भी यह दबाव महसूस हो रहा है। तभी भागवत ने यह बात कही है। और तभी ऐसा लग रहा है कि सरकार इसे नहीं लागू करने जा रही है। गौरतलब है कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई हुई तो केंद्र सरकार ने कहा कि वह इन दिशानिर्देशों पर पुनर्विचार कर रही है। इसके बाद मामला टल गया।

इस बीच सरकार के सूचना सलाहकारों में से एक दिलीप मंडल ने इसे लेकर एक लंबी पोस्ट लिखी। वे दलित, आदिवासी और पिछड़ा उत्पीड़न के लिए सामान्य वर्ग को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। लेकिन उनका सुर बदला हुआ था। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि रोहित वेमुला मामले के बाद कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट गए थे और कोर्ट ने नए दिशानिर्देश बनाने को कहा था, जिसके बाद यूजीसी के कुछ अधिकारियों ने दिशानिर्देश बना दिए। इसके आगे उन्होंने कहा कि सरकार ने उन्हें लागू नहीं किया है। उन्होंने अपनी तरफ से अधिकारियों पर ठीकरा फोड़ कर राजनीतिक नेतृत्व को बचाने का प्रयास किया। इससे भी लग रहा है कि सरकार इस मसले पर पीछे हट गई है।

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