भारत में पिछले 12 साल से लगातार प्रतीकात्मक चीजें हो रही हैं। राज पथ को कर्तव्य पथ पर किया गया। रेसकोर्स रोड को लोक कल्याण मार्ग तो राजभवनों को लोक भवन कर दिया गया। लेकिन क्या इससे आम लोगों का सचमुच कल्याण ज्यादा होने लगा? हालांकि यह एक सब्जेक्टिव मामला है, जिस पर लोगों की अलग अलग राय हो सकती है। लेकिन अगर किसी सरकार को जनता का कल्याण करना है तो निश्चित रूप से उसमें उस नेता को आवास का पता या उसके सामने वाली सड़क का नाम या उसके बैठने वाली जगह के नाम से कोई फर्क नहीं पड़ता है। जन कल्याण नीतियों से होता है, जो कहीं भी बैठ कर बनाई जा सकती हैं। भारत में अंतरिक्ष के क्षेत्र में तरक्की की तो यह इसलिए नहीं हुआ कि इसरो का मुख्यालय किसी अंतरिक्ष यान के नाम पर रखी गई सड़क के किनारे था।
फिर भी सरकार प्रतीकात्मक राजनीति को नए लेवल पर ले जा रही है। प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम सेवा तीर्थ कर दिया है और वहां एक सूत्र वाक्य लिखा है, ‘नागरिक देवो भव’। भारत में अतिथि को देव कहा जाता है लेकिन अतिथियों के साथ भारत में कैसा बरताव होता है वह हर घर में या टूरिस्ट प्लेस पर देख सकते हैं। अतिथि देवों को भारत के लोगों से बचाने के लिए हर जगह पुलिस तैनात करनी पड़ रही है। उसी तरह यह तय मानें कि नागरिक देव कभी भी सेवा तीर्थ तक नहीं पहुंच सकता है। वैसे भी तीर्थ का अर्थ वह जगह होता है, जहां लोगों को सिर झुकाना होता है। आज कल ज्यादातर तीर्थों पर हिंदुओं को बाहर से ही माथा टेकना होता है। सो, सेवा तीर्थ पर भी दूर से ही माथा टेक कर वहां बैठे भगवान से मन्नत पूरी करने की प्रार्थना करनी होगी।
