यह बड़ा सवाल है कि यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ रविवार, आठ मार्च को दिल्ली में दो अलग अलग जगहों पर प्रस्तावित रैलियों को रोकने के लिए पुलिस ने इतनी ज्यादती की? दिल्ली में बड़ी रैलियां और प्रदर्शन होते रहे हैं। ऊपर से सवर्ण समाज यानी सामान्य वर्ग की ओर से होने वाली रैली को लेकर कोई ऐसी तैयारी भी नहीं थी कि वह किसान आंदोलन या शाहीन बाग आंदोलन की तरह लंबा चलेगा। फिर भी दिल्ली से लेकर नोएडा और एनसीआर के दूसरे क्षेत्रों में पुलिस ने इस आंदोलन का समर्थन करने वालों को हाउस अरेस्ट किया, उनकी गाड़ियां रोकीं और लोगों को प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान और जंतर मंतर पहुंचने से रोका।
भाजपा के इकोसिस्टम के कई बड़े इन्फ्लूएंसर्स को उनके घरों में कैद किया गया। अजीत भारती, सर्वेश पांडेय, यति नरसिंहानंद, डॉ. उदिता त्यागी जैसे लोकप्रिय और भाजपा का समर्थन करने वाले लोगों को उनके घरों में गिरफ्तार करके रखा गया। सवाल है कि ऐसा करने की क्या जरुरत थी? यह सवाल इसलिए है क्योंकि प्रदर्शन रोकने की कोशिश और समर्थकों को हाउस अरेस्ट करने से इस मामले में भाजपा का विरोध बढ़ा है। सवर्ण समाज के लोग ज्यादा आंदोलित हुए हैं। वे पूछ रहे हैं कि दिल्ली में कई महीने तक शाहीन बाग का धरना चल सकता है और एक साल तक किसान आंदोलन कर सकते हैं लेकिन सवर्ण समाज यूजीसी की भेदभावपूर्ण नियमावली के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं? इससे भाजपा को नुकसान हो रहा है। हालांकि कहा जा रहा है कि प्रदर्शन की तारीख के कारण विवाद हुआ। आठ मार्च को दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी के सरकारी कार्यक्रम और सभा थी। इसलिए इतनी ज्यादती हुई है।
