केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के राजनीतिक भविष्य को लेकर ज्यादा कयास लगाने की गुंजाइश नहीं है। उनके सामने दो ही विकल्प दिख रहे हैं। वे खुद से इस्तीफा देंगे या मंत्रिमंडल में जब भी अगली फेरबदल होगी तो उनको ड्रॉप किया जाएगा? इस्तीफा देंगे तो अभी देंगे या कुछ समय के बाद देंगे यह सवाल भी है। नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्रियों की विदाई के कई तरीके बने हैं। एक तरीका निहालचंद का है, जो राजस्थान के सांसद थे और उनके ऊपर एक महिला से बलात्कार के आरोप थे। तमाम विवाद के बावजूद उनका इस्तीफा नहीं हुआ था। लेकिन मंत्रिमंडल की फेरबदल में वे चुपचाप हटा दिए गए थे। एक मॉडल एमजे अकबर वाला भी है। महिला पत्रकारों ने उनके ऊपर यौन शोषण के आरोप लगाए तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। एक बार तो प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सरकार के अनेक ऐसे मंत्रियों को ड्रॉप कर दिया था, जो अपने को भाजपा और सरकार का अनिवार्य हिस्सा मानते थे। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पास एक मॉडल गुजरात वाला भी, जहां वे एक ही बार में सारे मंत्री हटा देते हैं।
सो, हरदीप पुरी के मामले में कौन सा मॉडल अपनाया जाएगा यह देखने वाली बात होगी। उनकी विदाई होगी यह तय है। पंजाब में अगले साल चुनाव हैं इस तर्क पर उनकी विदाई नहीं टलने वाली है क्योंकि पंजाब में भाजपा का कुछ बहुत बड़ा दांव पर नहीं लगा है और दूसरे पुरी पंजाब में वोट नहीं दिला सकते हैं और न वोट का नुकसान कर सकते हैं। उनकी विदाई हो उससे पहले मीडिया का इस्तेमाल करके और उनसे लगातार इंटरव्यू दिला कर इस मामले को उलझाने की कोशिश की जा रही है। ऐसा भी अक्सर होता है। वे लगातार इंटरव्यू देकर अपने को बेकसूर बता रहे हैं और मीडिया का एक हिस्सा उनका तो बचाव कर ही रहा है, उनके साथ साथ जेफ्री एपस्टीन का भी बचाव करने लगा है। अडानी समूह के चैनल की एक एंकर ने तो एपस्टीन के दो रूप बता दिए। एक रूप बच्चों का यौन शोषण करने और महिलाओं, बच्चों की तस्करी करने वाले यौन अपराधी का और दूसरा पावर ब्रोकर का। इससे पुरी को यह कहने में सुविधा हुई कि उनका संबंध इस पावर ब्रोकर वाले रूप के साथ था।
बहरहाल, पुरी के मसले पर सरकार की स्थिति सांप छुछुंदर वाली है क्योंकि उनका इस्तीफा दिलाते हैं तो अपराध स्वीकार करने जैसा होगा। हालांकि कायदे से ऐसा होना नहीं चाहिए। ऐसी किसी घटना पर इस्तीफा देना नैतिक चरित्र दिखाता है। लेकिन अगर वह दिखाना होता तो अभी तक इस्तीफा हो गया होता। देरी हो रही है इसका कारण यह है कि ये मामला सिर्फ पुरी का नहीं रह गया है, बल्कि सरकार का हो गया है। कांग्रेस सवाल पूछ रही है कि 2014 से 2016 के बीच जब पुरी किसी पद पर नहीं थे तो क्या उनको बैकचैनल डिप्लोमेसी के लिए सरकार की ओर से लगाया गया था? इसके साथ साथ यह भी पूछा जा रहा है कि वॉशिंगटन और न्यूयॉर्क में भारत के तीन राजदूत हर समय होते हैं, वे क्या कर रहे थे, जो पुरी की सेवाएं ली जा रही थीं? इन सवालों में सरकार उलझती है। इस्तीफा हुआ तो ये सवाल ज्यादा मुखर होंगे और सरकार को जवाब देना होगा। दूसरी ओर अगर इस्तीफा नहीं होता है तो विपक्ष लगातार ये सवाल उठाता रहेगा और इसके साथ साथ दूसरे सवाल भी आएंगे। उद्योगपति अनिल अंबानी का मामला आएगा। अभी एपस्टीन फाइल्स का बहुत छोटा सा हिस्सा खुला है। आगे ज्यादा मामले खुल सकते हैं। तभी सरकार के लिए कैच 22 सिचुएशन है। कहा जा रहा है कि मई या जून तक किसी तरह मामले को खींचने की सोच बनी है। उस समय मंत्रिमंडल में फेरबदल होगी तो उनको ड्रॉप किया जा सकता है।
