यह सवाल इसलिए है क्योंकि एक केंद्रीय एजेंसी नेशनल कौंसिल ऑफ एप्लायड इकोनॉमिक्स एंड रिसर्च यानी एनसीएईआर ने एक सर्वे किया है, जिसमें कहा गया है कि बिहार में शराबबंदी से बहुत नुकसान है और इसके अनुपात में फायदा बहुत बहुत कम है। एनसीएईआर का कहना है कि शराबबंदी को यह कह प्रचारित किया गया कि इससे घरेलू हिंसा में और महिलाओं के प्रति अपराध में कमी आई है लेकिन असल में ऐसा नहीं है। इस सर्वे के मुताबिक पिछले कुछ समय से महिलाओं के प्रति अपराध में बढ़ोतरी देखी गई है। इसके अलावा सरकार को वित्तीय नुकसान का भी बड़ा आंकड़ा बताया गया है। कहा गया है कि शराबबंदी से राजस्व का नुकसान हो रहा है और इस कानून को लागू करने में जो खर्च हो रहा है वह भी बहुत बड़ा है।
तभी यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या बिहार की भाजपा सरकार नीतीश कुमार द्वारा लागू शराबबंदी खत्म कर सकती है? हालांकि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इससे इनकार किया है। फिर भी केंद्रीय एजेंसी के सर्वे को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता है। इस बीच नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यू ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया है। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने आरोप लगाया है कि यह सर्वे शराब कंपनियों ने कराया है। जाहिर है जद ने एक स्टैंड ले लिया है कि वह शराबबंदी खत्म नहीं होने देगी। सरकार को वित्तीय नुकसान और राजनीतिक नफा नुकसान को पलड़े पर रख कर तौलना होगा। अगर जनता दल यू तैयार नहीं होती है तो सरकार इस मामले में पहल नहीं करेगी।
