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आदिवासी नाराज हैं भाजपा से!

क्या आदिवासी समाज भारतीय जनता पार्टी से नाराज है? यह सवाल कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद एक बार फिर उठा है क्योंकि राज्य में भाजपा एक भी आदिवासी सीट नहीं जीत पाई है। इससे पहले झारखंड विधानसभा चुनाव के बाद भी यह सवाल उठा था और उससे पहले छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में भी इसकी चर्चा हुई। देश की दो सबसे बड़े आदिवासी आबादी वाले राज्यों- छत्तीसगढ़ और झारखंड में भाजपा चुनाव हारी। उसमें सबसे खास बात यह रही कि आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों पर भाजपा ज्यादा बुरी तरह से हारी। झारखंड में तो वह अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सिर्फ दो ही सीट पर चुनाव जीत पाई। झारखंड में आदिवासी समाज के लिए 28 सीटें आरक्षित हैं, जिसमें से भाजपा को सिर्फ दो सीट मिली, जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा ने 19 और कांग्रेस ने छह सीट जीती। एक सीट झारखंड विकास मोर्चा की टिकट पर बाबूलाल मरांडी जीते थे, जो बाद में भाजपा में चले गए। उनको मिला कर राज्य में भाजपा के सिर्फ तीन आदिवासी विधायक हैं।

यही कहानी कर्नाटक में दोहराई गई है। राज्य में अनुसूचित जनजाति यानी एसटी समुदाय के लिए 15 सीटें आरक्षित हैं, जिनमें से भाजपा एक भी सीट नहीं जीत पाई है। आदिवासी समाज के लिए आरक्षित 15 में से 14 सीटें कांग्रेस ने जीती है और एक सीट जेडीएस के खाते में गई है। इससे पहले 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को सात आदिवासी सीटों पर जीत मिली थी। इतना ही नहीं अनुसूचित जाति यानी एससी समुदाय के लिए आरक्षित सीटों पर भी भाजपा को बड़ा झटका लगा है। राज्य में 36 सीटें एससी समुदाय के लिए आरक्षित हैं, जिनमें से भाजपा को सिर्फ 12 सीटें मिली हैं, पिछली बार वह 26 सीटों पर जीती थी। इस बार कांग्रेस 21 सीटें हासिल करने में कामयाब रही है। ध्यान रहे चुनाव से पहले भाजपा ने एससी और एसटी के आरक्षण में कुछ बदलाव किया था इसके बावजूद उसे कोई फायदा नहीं हुआ।

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