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कर्ज और गैर- बराबरी

जीएसटी

बुनियादी विकास में निवेश घटने का दुष्प्रभाव गरीब तबकों पर पड़ता है। उधर सरकार जो ऋण लेती है, उस पर दिया जाने वाला ब्याज अंततः धनी लोगों की जेब में ही पहुंचता है। इससे वे और धनी होते हैं।

साल 2024-25 में भारत सरकार पर देशी ऋण 8.35 और विदेशी कर्ज 9.83 फीसदी बढ़ा। उधर पिछले वित्त वर्ष की तुलना में उसके पूंजीगत खर्च में 0.08 प्रतिशत की गिरावट आई। ये आंकड़ें सीएजी की ताजा रिपोर्ट से सामने आए हैं। स्पष्टतः ऋण बढ़ने का एक प्रमुख कारण पिछले कर्ज (और उस पर ब्याज) को चुकाने के लिए लिया गया नया कर्ज है। कर्ज के बढ़ते बोझ का खामियाजा पूंजीगत व्यय (यानी ठोस विकास कार्यों) को चुकाना पड़ रहा है। यह चिंताजनक रुझान है। ऋण से पूंजी निर्माण या सामाजिक विकास हो रहा हो, तो उस कर्ज की सकारात्मक भूमिका समझी जाती है।

लेकिन ऋण की रकम रोजमर्रा के उपभोग या पिछले ऋण को चुकाने में खर्च हो रही हो, अथवा कर्ज लेकर हुए निवेश के लाभ चंद हाथों में सिमट रहे हों, तो समझा जाएगा कि देश दुर्दशा की तरफ जा रहा है। सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकांटिबिलिटी नाम के गैर-सरकारी संगठन की ताजा रिपोर्ट- ‘वेल्थ ट्रैकर इंडियाः 2026’ इस बारे में एक महत्त्वपूर्ण जानकारी देती है। इसके मुताबिक 2029 से 2025 की अवधि में भारत के पांच सबसे अधिक समृद्ध परिवारों के धन में 400 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जबकि निचली 50 फीसदी आबादी का धन जहां का तहां रहा।

इतनी बड़ी जनसंख्या के पास देश का महज 6.4 प्रतिशत धन है। गौरतलब है कि पूंजीगत व्यय में गिरावट की सबसे ज्यादा मार इन तबकों पर ही पड़ती है। मानव एवं भौतिक विकास में निवेश घटने का अर्थ है इन तबकों की प्रगति की आस का कमजोर पड़ना। उधर चूंकि सरकार ऋण धनी लोगों के स्वामित्व वाले संस्थानों से ही लेती है, तो उस पर दिया जाने वाला ब्याज उन लोगों की जेब में पहुंचता है। यानी उनका धन और बढ़ता है। वेल्थ ट्रैकर रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि देश के 1,688 अति धनी व्यक्तियों (1000 करोड़ रुपये से अधिक संपत्ति वाले) पर वेल्थ टैक्स लगा कर सरकार 10 लाख करोड़ रुपये सालाना जुटा सकती है। इससे आम जन के विकास के लिए जरूरी धन का इंतजाम हो सकेगा। मगर ऐसा तब होगा, जब सर्वांगीण विकास सचमुच सरकार की प्राथमिकता होगी!

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