राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव नतीजों को मोदी ने भाजपा की “प्रचंड जीत” बताया है। लेकिन जमीनी हकीकत से यह टिप्पणी मेल नहीं खाती- खासकर यह देखते हुए कि राजस्थान में भाजपा की सरकार है।
स्थानीय निकाय चुनावों के आधार पर सियासी रुख का अनुमान लगाना अक्सर जोखिम भरा होता है। इसलिए कि एक तो ऐसे चुनावों में स्थानीय मुद्दे/ समीकरण खास हावी रहते हैं, और दूसरे, लोकसभा या विधानसभा चुनाव की तुलना में पार्टियों की प्रबंधन क्षमता से इनके नतीजे अधिक प्रभावित होते हैं। इसीलिए अक्सर राज्य की सत्ताधारी पार्टी (शहरी और ग्रामीण) स्थानीय निकाय चुनावों में लाभ की स्थिति में रहती है। राजस्थान में शहरी निकाय चुनाव के ताजा नतीजों पर विचार करते समय उपरोक्त दोनों पहलुओं को जरूर ध्यान में रखाना चाहिए। निर्विवाद रूप से एक- यानी सत्ता में होने का लाभ भारतीय जनता पार्टी के साथ था।
इसके बावजूद इन चुनावों में खास दिलचस्पी इस तथ्य से बनी कि कॉकरोच आंदोलन के बाद किसी राज्य के तमाम शहरी क्षेत्र में हुआ यह पहला चुनाव था। इस आंदोलन में जिस युवा असंतोष का इजहार हुआ, क्या उसका कोई चुनावी परिणाम है, इस सवाल पर लगातार चर्चा चली है। फिर ढहते शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर और कॉकरोच अभियान से स्कूलों की सामने आई खस्ता हालत भी चर्चा में हैं। क्या उनका कुछ असर हुआ? चुनाव नतीजों के मुताबिक भाजपा ने 40.8 फीसदी सदस्य सीटें जीतीं। कांग्रेस 35.3 प्रतिशत और निर्दलीय एवं अन्य उम्मीदवार लगभग 24 फीसदी सीटों पर जीते। यानी 59 फीसदी सीटों पर भाजपा की हार हुई। नगर निगम चुनाव में भाजपा दस में चार में ही स्पष्ट बहुमत हासिल कर पाई।
हैरतअंगेज है कि इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भाजपा की “प्रचंड जीत” बताया है। उन्होंने कहा कि “यह झूठ की गूंज के सामने सत्य की विजय का प्रमाण है।” स्पष्टतः जमीनी हकीकत से यह टिप्पणी मेल नहीं खाती- खासकर यह देखते हुए कि राजस्थान को भाजपा का पारंपरिक गढ़ समझा जाता है। हां, यह जरूर कहा जाएगा कि भाजपा के सबसे आगे रहने के कारण फिलहाल इस नैरेटिव को बल नहीं मिला है कि युवा असंतोष राजनीति में निर्णायक पहलू बन सकता है। असल में जाहिर यह हुआ कि अपनी खास समस्याओं के हल के लिए मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से मजबूत रहे दलों के इतर विकल्प ढूंढने लगा है।
