आठ अप्रैल को हुए 14 दिन के युद्धविराम का क्या होगा? क्या अमेरिका और ईरान अभी इस अवधि तक संयम बरतते हुए गतिरोध तोड़ने की किसी प्रक्रिया में शामिल होंगे या जल्द ही एक दूसरे पर हमले शुरू कर देंगे?
अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में 21 घंटों के अंदर शांति वार्ता का टूट जाना हैरतअंगेज नहीं है। अमेरिका के उप-राष्ट्रपति जे.डी. वान्स ने कहा है कि ईरान ने अमेरिकी शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। उधर ईरान का कहना है कि अमेरिका जिन मकसदों को युद्ध से हासिल नहीं कर सका, उन्हें बातचीत से पाने की कोशिश की, इसलिए बात आगे नहीं बढ़ी। नतीजतन, अब दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने अपनी- अपनी राजधानियों का रुख किया है।
इसके साथ ही ये गंभीर सवाल दुनिया के सामने है कि आठ अप्रैल को हुए 14 दिन के युद्धविराम का क्या होगा? क्या दोनों पक्ष अभी इस अवधि तक संयम बरतते हुए गतिरोध तोड़ने की किसी प्रक्रिया में शामिल होंगे या जल्द ही एक दूसरे पर हमले शुरू कर देंगे? जहां तक गतिरोध टूटने की बात है, तो वह इस पर निर्भर करता है कि अमेरिका बातचीत में किस हद तक लेन-देन का नजरिया अपनाने को तैयार होता है और ईरान अपने रुख में कितनी नरमी लाता है? इस्लामाबाद में बातचीत की जमीन शुरुआत से भुरभुरी बनी रही। एक तो इजराइल ने लेबनान पर हमले नहीं रोके, दूसरे बातचीत के बीच में ही अमेरिका ने होरमुज जलडमरूमध्य को खुलवाने के लिए अपनी नौसेना के जहाज भेज दिए। इससे ईरानियों में ये भावना गहराई कि अमेरिका बातचीत को बहाना बनाकर पीछे से वार करता है।
उधर, अमेरिका इस रुख पर कायम रहा कि ईरान को संवर्धित यूरेनियम का सरेंडर करना होगा। विडंबना है कि फरवरी में जिनेवा वार्ता के दौरान ईरान इसके लिए राजी हो गया था। लेकिन तब अमेरिका ने इजराइल के साथ मिल कर ईरान पर हमला बोल दिया। अब उसी मांग को मानने के लिए ईरान तैयार नहीं हुआ। संभवतः अपने इस आकलन के कारण कि होरमुज पर अपने नियंत्रण और खाड़ी में अनेक अमेरिकी सैन्य अड्डों को नष्ट करने के बाद वह मजबूत स्थिति में है। बहरहाल, दोनों पक्ष अगर युद्ध जारी रहने से होने वाले नुकसानों पर गौर करें, तो शायद अभी भी रास्ता निकल सकता है। वरना, आर्थिक एवं ऊर्जा संकट दुनिया को त्रासद मुकाम तक पहुंचा देगा।
