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शेयर मार्केट का ड्रामा

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भाजपा की सफलता- विफलता से शेयर बाजारों का रुख क्यों जुड़ा हुआ है? भाजपा को झटका लगा, तो उससे शेयर बाजार क्यों परेशान हुए? क्या यह सोच कर कि गठबंधन की मजबूरियों में अगली सरकार को सामाजिक क्षेत्र पर खर्च बढ़ाना होगा?

इस हफ्ते शेयर बाजारों में नाटकीय घटनाएं हुई हैं। शनिवार को एग्जिट पोल घोषित हुए, तो शेयर बाजार के कर्ता-धर्ता बल्लियों उछल गए। तो सोमवार को बाजार खुलते ही शेयरों के भाव भी उछलते चले गए। अगले दिन जब मतगणना हुई, तो शेयर बाजार का सामना हकीकत से हुआ। भाजपा को परिकथा जैसी सफलता मिलने के बजाय पार्टी के लिए अपने दम पर साधारण बहुमत जुटाना भी दूभर हो गया। इस खबर के साथ शेयर सूचकांकों में वैसी गिरावट आई, जैसा कभी-कभार ही होता है। मतगणना के दिन यानी मंगलवार को बाजार बंद हुए, तो सूचकांक पौने छह फीसदी नीचे थे। सवाल है कि भाजपा की सफलता- विफलता से शेयर बाजारों का रुख इस हद तक क्यों जुड़ा हुआ है? भाजपा को झटका लगा, तो उससे शेयर बाजार क्यों परेशान हुए? क्या यह सोच कर कि अब गठबंधन की मजबूरियों में अगली सरकार को सामाजिक क्षेत्र पर खर्च बढ़ाना होगा? दूरगामी नजरिए से देखें, तो ऐसा होने पर भारतीय बाजार का विस्तार होगा। हकीकत यह है कि मोदी राज में भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार सिकुड़ा है। लगभग 60 फीसदी आबादी की आय घटी है, नजीजतन आबादी के इस हिस्से को अपने उपभोग में कटौती करनी पड़ी है। इसका सीधा असर उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार पर पड़ा है। उससे प्राइवेट निवेश प्रभावित हुआ है।

परिणाम यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह सरकारी निवेश पर निर्भर हो गई है। भारत की उच्च वृद्धि दर का सबसे बड़ा हिस्सा असल में वित्तीय बाजारों और हाई टेक क्षेत्र से आ रहा है, जिसका दो तिहाई आबादी के कोई संबंध नहीं है। प्रश्न है कि क्या शेयर बाजार इतनी बड़ी आबादी की दुर्दशा की कीमत पर चमकना चाहता है? शेयर बाजारों की ऐसी प्रतिक्रिया से इस समझ की पुष्टि हुई है कि वित्तीय पूंजीवाद के इस दौर में शेयर सूचकांक और आम जन की जिंदगी के बीच अंतर्विरोधी संबंध बन गया है। जबकि पारंपरिक समझ यह थी कि शेयर बाजार निवेश- उत्पादन- वितरण आधारित वास्तविक अर्थव्यवस्था के सूचक होते हैं- यानी उनकी उछाल लोगों की खुशहाली का भी सूचक होती है। लेकिन अब सूरत बिल्कुल बदल गई है।

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