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आयोग का अजीब रुख

Election Commission

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जो आंकड़े 2019 के आम चुनाव तक स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत मतदान के हर चरण के बाद सार्वजनिक किए जाते थे, इस बार उसको लेकर निर्वाचन आयोग ने जैसी हिचक या कहें प्रतिरोध का रुख दिखाया है, वह अजीबोगरीब है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह बताने के लिए एक हफ्ते- यानी 24 मई तक- का वक्त दे दिया है कि निर्वाचन आयोग को मतदान संबंधी संपूर्ण विवरण प्रकाशित करने में दिक्कत क्या है? जो आंकड़े 2019 के आम चुनाव तक स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत मतदान के हर चरण के बाद सार्वजनिक किए जाते थे, इस बार उसको लेकर निर्वाचन आयोग ने जैसी हिचक या कहें प्रतिरोध का रुख दिखाया है, वह अजीबोगरीब है। जब विपक्षी हलकों में पहले से आम चुनाव की प्रक्रिया को लेकर संशय का आलम है, तब निर्वाचन आयोग के इस रुख से अविश्वास और गहरा ही हुआ है। यह बात विपक्षी नेताओं और सिविल सोसायटी के संगठनों की प्रतिक्रिया से जाहिर है। इस बारे में लगातार गर्म चर्चा के बीच आयोग ने 16 मई को जानकारी दी कि अभी तक हुए मतदान के चारों चरणों में कुल मिलाकर करीब 45 करोड़ लोगों (66.95 प्रतिशत) ने वोट डाले हैं।

इसके पहले विपक्षी पार्टियों और चुनाव प्रक्रिया के कई जानकारों ने सवाल उठाया था कि आयोग हर चरण के मतदान के आंकड़े जारी करने में ज्यादा समय क्यों ले रहा है। चार चरण के बाद उसने जो संख्या बताई है, वह मतदान के दिन बताई संख्याओं के योग से एक करोड़ सात लाख ज्यादा है। इसके पहले दो चरणों का मतदान खत्म होने के बाद और उसके अगले दिन आयोग ने मतदान प्रतिशत का जो तात्कालिक आंकड़ा दिया था, बाद में उसमें पांच प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी गई। तो इस मामले में तीन खास सवाल उठे हैः पहला, आयोग आंकड़े जारी करने में ज्यादा समय क्यों ले रहा है? दूसरा, फौरी और अंतिम आंकड़ों में ज्यादा अंतर क्यों है? और तीसरा, आयोग मतदान प्रतिशत के साथ हर चुनाव क्षेत्र में पड़े मतों की संख्या कब बताएगा? फिलहाल आयोग ने जो संख्या जारी की है, लेकिन हर निर्वाचन क्षेत्र की संख्या के बजाय पूरे राज्य का सकल आंकड़ा है। इससे बेवजह संदेह बढ़ा है। इसलिए उचित होगा कि आयोग सुप्रीम कोर्ट की अगली तारीख से पहले ही सारा विवरण सार्वजनिक कर दे। चुनाव की विश्वसनीयता के लिहाज से वह एक ठोस कदम होगा।

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