सऊदी अरब की निगाह ईरान की बढ़ती ताकत को संतुलित करने के साथ-साथ ग्रेटर इजराइल की महत्त्वाकांक्षा के खिलाफ मोर्चा बनाना भी है। मगर, पाकिस्तान के भी अपने मकसद हैं, जिसके निशाने पर हमेशा भारत ही रहता है।
पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब और तुर्किये के त्रिपक्षीय रक्षा समझौते का निशाना फिलहाल संभवतः ईरान है, लेकिन यह महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम है, जिस पर भारत को भी नज़र रखनी चाहिए। इस करार का सबसे अहम पहलू नाटो की तर्ज पर इसमें शामिल यह सिद्धांत है कि किसी एक सदस्य देश पर हमला सब पर हमला समझा जाएगा। इस शर्त के साथ हुआ ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौता’ पश्चिम एशिया और यहां तक कि दक्षिण एशिया के भी भू-राजनीतिक संतुलन पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। भारत के नजरिए से इस तथ्य को याद करना उपयोगी होगा कि 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के समय तुर्किये ने खुलकर पाकिस्तान की मदद की थी।
सऊदी अरब की भूमिका ऊपरी तौर पर अब तक तटस्थ रही है, लेकिन इस करार के बाद संभवतः ये स्थिति कायम नहीं रहेगी। सऊदी अरब मजबूत वित्तीय ताकत है, जिसका इस्लामी दुनिया पर गहरा राजनीतिक प्रभाव है। ऑपरेशन सिंदूर के तुरंत बाद पाकिस्तान का उससे रक्षा समझौता हुआ था। तब अनुमान लगाया गया था कि साझा सैन्य तैयारियों के लिए अब पाकिस्तान को अधिक आर्थिक संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं। अब तुर्किये भी इस गठबंधन में शामिल हो गया है। तुर्किये नाटो का सदस्य है। संख्या के लिहाज से नाटो के भीतर दूसरी सबसे बड़ी सेना उसके पास ही है। साथ ही नाटो का सदस्य होने के नाते उन्नत रक्षा-तकनीक (ड्रोन, नौसेना सिस्टम, हथियार) उसके पास मौजूद रही है।
फिलहाल, समझा जाता है कि पश्चिम एशिया में ईरानी हमलों के कारण अमेरिकी अड्डो को हुए भारी नुकसान और अमेरिकी सुरक्षा कवच पर घटे भरोसे के कारण सऊदी अरब ने परमाणु अस्त्र संपन्न देश पाकिस्तान और तुर्किये को मिलाकर एक मजबूत सैन्य तैयारी का प्रयास किया है। उसकी निगाह ईरान की बढ़ती ताकत को संतुलित करने के साथ-साथ ग्रेटर इजराइल की महत्त्वाकांक्षा के खिलाफ मोर्चा बनाना भी है। मगर, इससे जुड़ने के पीछे पाकिस्तान के अपने मकसद भी हैं, जो अपनी सारी रणनीति भारत को ध्यान में रखकर बनाता है। अतः संभव है कि इस करार से भारत की चुनौतियां भी बढ़ गई हों। इसीलिए इस पर बारीक निगाह रखने की जरूरत है।
